मस्जिदों में कौन देगा जुमे का उपदेश? वक्फ के प्रस्ताव के बाद उलेमाओं ने…

जम्मू कश्मीर वक्फ बोर्ड (Waqf Board) द्वारा शुक्रवार के उपदेश (खुतबा) को लेकर जारी किए गए आदेश के बाद राज्य में राजनीतिक और धार्मिक विवाद गहरा गया था। हालांकि दबाव के बाद बोर्ड ने अपना आदेश वापस ले लिया, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद धार्मिक विद्वानों ने एक नया जवाबी अभियान शुरू कर दिया है।
इस अभियान का नेतृत्व ‘मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा जम्मू-कश्मीर’ (MMU) कर रहा है, जिसका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की मस्जिदों में होने वाली धार्मिक चर्चाओं के नैरेटिव पर अपना नियंत्रण वापस पाना और मुस्लिम समुदाय के बीच धार्मिक जागरूकता को मजबूत करना है।
इन इलाकों में दिया गया पहला ‘समन्वित उपदेश’
इस पहल के तहत शुक्रवार को कश्मीर घाटी, जम्मू, चिनाब घाटी, करगिल और लेह की मस्जिदों और इमामबाड़ों में एक ही साझा विषय पर ‘समन्वित उपदेश’ (Coordinated Sermon) दिया गया। MMU परिषद ने इस पहले खुतबे के लिए ‘ईमान’ (आस्था) को विषय के रूप में चुना था। पूरे क्षेत्र में इमामों ने इसी थीम पर सामूहिक रूप से अपनी बात रखी।
यह नया अभियान 15 सितंबर को आयोजित ‘MMU उलेमा कॉन्फ्रेंस’ में लिए गए निर्णयों का परिणाम है। इस कॉन्फ्रेंस में विभिन्न विचारधाराओं के प्रमुख धार्मिक विद्वानों और प्रतिनिधियों ने सहमति जताई थी कि वे शुक्रवार के उपदेशों, जिला-स्तरीय कार्यक्रमों और निरंतर जागरूकता अभियानों के जरिए प्रमुख सामाजिक और धार्मिक मुद्दों को सामूहिक रूप से उठाएंगे।
चरार-ए-शरीफ में मीरवाइज उमर फारूक का संबोधन
इस पहल के तहत, अलगाववादी नेता और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज मौलवी मोहम्मद उमर फारूक ने ऐतिहासिक चरार-ए-शरीफ (Charar-e-Sharief) में हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी (RA) की खानकाह में शुक्रवार का मुख्य उपदेश दिया।
उन्होंने दुनियावी प्रलोभनों, दबावों और चुनौतियों के सामने अपने विश्वास (ईमान) और सिद्धांतों पर अडिग रहने पर जोर दिया। मीरवाइज ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ‘ईमान’ केवल एक मौखिक दावा नहीं है, बल्कि यह एक आस्तिक के पूरे जीवन का आधार है जो उसके आचरण, फैसलों और व्यवहार में झलकना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी धन, पद या दुनियावी फायदा किसी के जमीर या सिद्धांतों से समझौता करने को सही नहीं ठहरा सकता।
‘ईमान’ को ही पहला विषय क्यों चुना गया?
MMU के अभियान का जिक्र करते हुए मीरवाइज ने बताया कि पहले साझा विषय के रूप में ‘ईमान’ का चयन जानबूझकर किया गया है। उनका कहना था कि आस्था ही वह बुनियादी बंधन है जो मुस्लिम उम्माह (समुदाय) को एकजुट करता है और यह विभिन्न संप्रदायों (मसलकों) की धार्मिक व्याख्याओं के मतभेदों से ऊपर है।
उन्होंने इमामों और उलेमाओं से अपील की कि चूंकि ‘मिंबर’ (उपदेश देने का स्थान) एक अमानत है, इसलिए उन्हें खुद ईमानदारी की मिसाल पेश करनी चाहिए। मीरवाइज ने कहा, “इस मंच का इस्तेमाल समाज का मार्गदर्शन करने और लोगों को करीब लाने के लिए होना चाहिए, न कि उनके बीच फूट डालने के लिए।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि आज के दौर में अपनी आस्था की रक्षा करना और भी जरूरी है, और एकजुट रहना ही हमलों को नाकाम करने का सबसे अच्छा तरीका है।
सुरक्षा एजेंसियों के रुख पर टिकी नजरें
वक्फ बोर्ड द्वारा अपना आदेश वापस लिए जाने के बाद, अब सभी की निगाहें जम्मू-कश्मीर प्रशासन, सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया विभागों पर टिकी हैं। यह देखना अहम होगा कि क्या प्रशासन MMU जैसे धार्मिक समूहों को मस्जिदों के भीतर के विमर्श (नैरेटिव) को पूरी तरह से नियंत्रित करने की अनुमति देगा, खासकर ऐसे माहौल में जहां कई लोग एकजुट धार्मिक समूह की गतिविधियों को सुरक्षा के लिहाज से संवेदनशील मानते हैं।

