E20 इथेनॉल पॉलिसी: क्या मक्के की मांग से महंगे होंगे अंडे और चिकन?

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Gautam Kumar Agarwal
Gautam Kumar Agarwal

भारत में E20 पेट्रोल का लक्ष्य हासिल करने के लिए तेल कंपनियों की इथेनॉल खरीद नीति में बदलाव किया गया है। गन्ने के रस और सिरप पर रोक के बाद अब इथेनॉल उत्पादन के लिए मक्के पर निर्भरता बढ़ने वाली है। इसका सीधा असर पोल्ट्री उद्योग की लागत और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर पड़ने की आशंका है।

1100 करोड़ लीटर इथेनॉल का टेंडर, गन्ने पर रोक

तेल कंपनियों ने 2026-27 के सप्लाई वर्ष के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने के लिए बोलियां आमंत्रित की हैं। नए टेंडर से गन्ने का रस, सिरप और B-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल को बाहर रखा गया है। चीनी का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में जाने से रोकने और खाद्य महंगाई पर नियंत्रण बनाए रखने के मकसद से यह फैसला लिया गया है।

मक्के से इथेनॉल बनाना तेल कंपनियों के लिए महंगा सौदा

गन्ने से जुड़े विकल्पों पर रोक के बाद तेल कंपनियों को अपनी इथेनॉल की जरूरत पूरी करने के लिए मक्का और C-हैवी मोलासेस की तरफ रुख करना पड़ रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर है। दूसरी तरफ B-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 60.73 रुपये प्रति लीटर है। मक्के से तैयार होने वाला इथेनॉल करीब 13.4 प्रतिशत महंगा है, जिससे तेल कंपनियों की कुल खरीद लागत में सीधा इजाफा होगा।

पोल्ट्री उद्योग की लागत पर असर

इथेनॉल उत्पादन में मक्के का इस्तेमाल बढ़ने से पोल्ट्री उद्योग के लिए कच्चे माल का संकट और लागत बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। भारत में पैदा होने वाले कुल मक्के का 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा पोल्ट्री फीड (मुर्गियों के चारे) के रूप में इस्तेमाल होता है।

मक्के का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में जाने से चारे की लागत बढ़ेगी। इसका सीधा असर बाजार में अंडे और चिकन की खुदरा कीमतों पर पड़ेगा। कीमतों में कितनी वृद्धि होगी, यह पूरी तरह से बाजार में मक्के की कुल उपलब्धता और सप्लाई चेन पर निर्भर करेगा।