उमर सरकार के कैबिनेट विस्तार से नाराज मुबारक गुल, अब चुप्पी क्यों?

जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) में इन दिनों अंदरूनी कलह सतह पर आ गई है। श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रूहुल्ला मेहदी के हालिया इस्तीफे के बाद पार्टी के भीतर सियासी घमासान तेज हो गया है। इसी बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष हाजी मुबारक गुल ने सोमवार (4 नवंबर) को प्रस्तावित अपनी अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस को अनिश्चित काल के लिए टाल दिया है, जिससे पार्टी संकट में एक नया मोड़ आ गया है।
असंतुष्ट विधायकों के गुट में शामिल हैं गुल
मुबारक गुल उन 18 असंतुष्ट विधायकों के समूह का हिस्सा बताए जाते हैं, जिन्होंने पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के खिलाफ मोर्चा खोला है। 30 अक्टूबर और 3 नवंबर को असंतुष्ट विधायकों की हुई गुप्त बैठकों में भी गुल की मौजूदगी की चर्चा थी।
दरअसल, 27 अक्टूबर को हुए उमर अब्दुल्ला सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार में जगह न मिलने के बाद मुबारक गुल ने ऐलान किया था कि वह 4 नवंबर को अपने भविष्य के राजनीतिक कदमों और पार्टी में बने रहने या छोड़ने को लेकर अहम घोषणा करेंगे।
प्रेस कॉन्फ्रेंस टालने का क्या दिया कारण?
अपनी प्रस्तावित प्रेस कॉन्फ्रेंस को ऐन मौके पर टालने की घोषणा करते हुए मुबारक गुल ने कहा कि वह जम्मू-कश्मीर के अस्थिर राजनीतिक हालात और अपने जमीनी कार्यकर्ताओं के साथ 50 साल पुराने भावनात्मक जुड़ाव के कारण यह फैसला ले रहे हैं।
मीडिया से बातचीत में गुल ने कहा, “जम्मू-कश्मीर के मौजूदा हालात, अपने साथियों के साथ विचार-विमर्श और 1975 से मेरे साथ खड़े कार्यकर्ताओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए, मैं घोषणा करता हूं कि आज की प्रेस कॉन्फ्रेंस टाल दी गई है।”
उन्होंने आगे कहा, “मैं फिलहाल इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहूंगा। इंशाअल्लाह, यह अपने सही समय पर होगा। मैं एक लड़ाका हूं और लड़ता रहूंगा।” उनके इस बयान के बाद वहां मौजूद समर्थकों ने “ईमानदार हाजी मुबारक गुल साहब जिंदाबाद” और “आवाज दो, हम एक हैं” के नारे लगाए।
राजनीतिक जानकारों का क्या है मानना?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुबारक गुल द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस टालने का फैसला यह संकेत देता है कि वह अपनी शिकायतों को सार्वजनिक मंच पर उठाने के बजाय पार्टी के आंतरिक मंचों के जरिए सुलझाना चाहते हैं। इस कदम से नेशनल कॉन्फ्रेंस के शीर्ष नेतृत्व को पार्टी के भीतर उठ रहे असंतोष को संभालने और डैमेज कंट्रोल के लिए थोड़ा समय मिल गया है।
हालांकि, पार्टी के भीतर सार्वजनिक आलोचना का यह नया मोर्चा फिलहाल रुक गया है, लेकिन श्रीनगर के सियासी गलियारों में सरगर्मी तेज है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पार्टी के अन्य बागी नेता भी रूहुल्ला के रास्ते पर चलेंगे या फिर नेतृत्व के साथ कोई समझौता होगा।

