कौन गरीब और कौन नहीं? भारत में गरीबी तय करने के पैमाने समझिए

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Prabhash Bahadur Civil Services Mentor
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देश में गरीबी के मोर्चे पर पिछले कुछ वर्षों में आए बड़े बदलावों और विश्व बैंक की रिपोर्ट के बाद यह सवाल अक्सर उठता है कि आखिर सरकारें और एजेंसियां किस आधार पर यह तय करती हैं कि कौन गरीब है और कौन नहीं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में सामने रखे गए आंकड़ों के मुताबिक, बीते एक दशक में करोड़ों लोगों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला गया है। इस पूरी प्रक्रिया के पीछे एक बेहद वैज्ञानिक, व्यवस्थित और आंकड़ों पर आधारित गणित काम करता है। आइए जानते हैं कि हमारे देश में गरीबी का आकलन करने के लिए कौन-कौन से तरीके, पैमाने और नियम अपनाए जाते हैं।

उपभोग व्यय पर आधारित मापन प्रक्रिया

भारत में गरीबी की रेखा तय करने के लिए पारंपरिक रूप से व्यक्ति की आय के बजाय उसके खर्च यानी मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) को मुख्य पैमाना माना जाता है।

इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में काम करता है, जहां लोगों की कमाई रोजाना या महीने के हिसाब से बदलती रहती है और उसका सटीक रिकॉर्ड रखना बेहद मुश्किल होता है। इसलिए सरकार यह देखती है कि एक परिवार अपने खानपान और रोजमर्रा की जरूरतों पर कितना पैसा खर्च कर रहा है।

एनएसएसओ के घरेलू उपभोग सर्वेक्षण

इस पूरी व्यवस्था को जमीन पर उतारने के लिए सांख्यिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (NSSO) नियमित अंतराल पर बड़े पैमाने पर घरेलू उपभोग सर्वेक्षण करता है। इन सर्वे के जरिए देश के कोने-कोने से यह डेटा जुटाया जाता है कि अलग-अलग परिवारों का उपभोग खर्च कितना है, जिससे यह पता चलता है कि आम जनता अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में सक्षम है या नहीं।

गरीबी का आकलन करने वाली प्रमुख समितियां

देश में गरीबी का सही और सटीक आकलन करने के लिए अलग-अलग समय पर कई नामी विशेषज्ञों की कमेटियों का गठन किया गया, जिन्होंने नीति निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई:

  • अलाघ समिति

  • लकड़वाला समिति

  • सुरेश तेंदुलकर समिति

  • सी. रंगराजन समिति

इन सभी कमेटियों ने अपने-अपने दौर की आर्थिक स्थितियों को ध्यान में रखते हुए गरीबी रेखा तय करने के लिए अलग-अलग मानक और फॉर्मूले सुझाए। उदाहरण के लिए, रंगराजन समिति के पैमाने के अनुसार ग्रामीण इलाकों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 32 रुपये और शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 47 रुपये से कम खर्च करने वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे माना गया था। हालांकि, समय के साथ महंगाई और जीवनशैली बदलने के कारण इसमें लगातार सुधार की आवश्यकता महसूस की जाती रही है।

नीति आयोग की भूमिका

ऐतिहासिक रूप से योजना आयोग इस पूरी प्रक्रिया की कमान संभालता था, लेकिन अब इसकी जगह नीति आयोग देश में गरीबी उन्मूलन और विकास से जुड़ी नीतियों की मुख्य रूप से निगरानी करता है। नीति आयोग यह सुनिश्चित करता है कि कल्याणकारी योजनाओं का सीधा फायदा उन वास्तविक परिवारों तक पहुंचे जो इस दायरे में आते हैं।

गरीबी सूचकांक का नया दौर: बहुआयामी गरीबी (MPI)

केवल पैसों या भोजन की कमी के आधार पर गरीबी तय करने का पुराना तरीका अब काफी हद तक बदल चुका है। वर्तमान समय में सरकार और नीति आयोग संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के साथ मिलकर आधुनिक बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index) का उपयोग करते हैं।

इस नए और व्यापक तरीके से यह देखा जाता है कि आम आदमी का जीवन स्तर कुल मिलाकर कैसा है और उसे किस तरह की बुनियादी सहूलियतें मिल पा रही हैं। इसके मुख्य तीन आधार हैं:

  1. स्वास्थ्य और पोषण: परिवार को पौष्टिक आहार मिल रहा है या नहीं, बाल और किशोर मृत्यु दर की स्थिति क्या है, और गर्भवती महिलाओं को सही मातृ स्वास्थ्य सेवाएं मिल रही हैं या नहीं।

  2. शिक्षा: बच्चों के स्कूल जाने के वर्ष और उनकी नियमित उपस्थिति की स्थिति।

  3. जीवन स्तर: घर में खाना पकाने के लिए साफ ईंधन, शौचालय की सुविधा, स्वच्छ पेयजल, बिजली कनेक्शन, पक्का आवास, बैंक खाता और बुनियादी संपत्तियों की उपलब्धता।

वंचित वर्ग का चयन: बहुआयामी सूचकांक के तहत यह नियम तय किया गया है कि यदि कोई व्यक्ति या परिवार बताए गए कुल संकेतकों में से एक-तिहाई यानी कम से कम 33.3 प्रतिशत या उससे अधिक सुविधाओं से वंचित पाया जाता है, तो उसे बहुआयामी रूप से गरीब माना जाता है।

गरीबी रेखा बास्केट (Poverty Line Basket) की अवधारणा

भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण के लिए ‘गरीबी रेखा बास्केट’ का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें उन जरूरी वस्तुओं और सेवाओं को शामिल किया जाता है जो इंसान को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए चाहिए होती हैं:

  • कैलोरी आधारित मानक: भोजन और ऊर्जा को आधार बनाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 2400 कैलोरी और शहरी क्षेत्रों के लिए 2100 कैलोरी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति ऊर्जा तय की गई है ताकि कुपोषण से लड़ा जा सके।

  • गैर-खाद्य खर्च: इसमें कपड़े, आवास, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, इलाज और आने-जाने के साधन जैसे जरूरी न्यूनतम खर्च भी शामिल होते हैं।

हेडकाउंट रेशो और पॉवर्टी गैप का गणित

गरीबी के आंकड़ों को समझने के लिए अर्थशास्त्री कुछ वैज्ञानिक सूत्रों का इस्तेमाल करते हैं:

  • हेडकाउंट रेशो (Headcount Ratio): यह वह अनुपात है जो यह बताता है कि कुल आबादी में से कितने प्रतिशत लोग तय की गई गरीबी रेखा के नीचे जीवन जी रहे हैं।

  • पॉवर्टी गैप (Poverty Gap): यह मापता है कि जो लोग गरीब हैं, उनकी औसत आय या खर्च गरीबी रेखा से असल में कितनी नीचे है, ताकि सुधार के ठोस कदम उठाए जा सकें।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व बैंक का पैमाना

देश की सीमाओं से बाहर निकलकर वैश्विक स्तर पर भी भारत में गरीबी का आकलन किया जाता है। विश्व बैंक क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity – PPP) के आधार पर यह तय करता है कि विभिन्न देशों में अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा के मुकाबले स्थिति कैसी है। विश्व बैंक की रिपोर्टों में भी इस बात की पुष्टि की गई है कि भारत ने पिछले एक दशक में करोड़ों लोगों को इस मुश्किल दौर से बाहर निकालने में बड़ी कामयाबी हासिल की है।