बदायूं में सपा का दबदबा या BJP की बढ़त? 6 सीटों का सियासी समीकरण

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपनी जमीनी तैयारियां शुरू कर दी हैं। रूहेलखंड का अहम जिला बदायूं हमेशा से समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच कड़े सियासी संघर्ष का गवाह रहा है। जिले की विधानसभा सीटों— बिसौली, सहसवान, बिल्सी, बदायूं, शेखूपुर और दातागंज— का इतिहास बताता है कि यहां किसी एक पार्टी का स्थायी रूप से एकछत्र राज नहीं रहा है। सपा जहां अपने पारंपरिक वोट बैंक पर निर्भर है, वहीं भाजपा ने लगातार अपनी पैठ बढ़ाई है।
आगामी विधानसभा चुनाव से पहले बदायूं जिले की इन अहम सीटों का चुनावी इतिहास और राजनीतिक समीकरण समझना जरूरी है।
सहसवान: सपा का अजेय दुर्ग, जहां से जीते थे मुलायम
सहसवान विधानसभा सीट को समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता है। 1993 के बाद से सपा ने 2007 (जब डीपी यादव जीते) को छोड़कर यहां लगभग सभी चुनाव जीते हैं। इस सीट का राजनीतिक महत्व इसी से समझा जा सकता है कि 1996 में खुद मुलायम सिंह यादव ने यहां से जीत दर्ज की थी। यादव और मुस्लिम मतदाताओं के मजबूत गठजोड़ के कारण भाजपा और बसपा आज तक इस सीट पर खाता नहीं खोल सकी हैं। 2022 के चुनाव में सपा के बृजेश यादव ने बसपा को 13,945 वोटों से हराकर यह सीट बरकरार रखी।
बिसौली: सपा का दबदबा, लेकिन हार-जीत का अंतर बेहद कम
अनुसूचित जाति (SC) के लिए सुरक्षित बिसौली सीट पर 1990 के दशक से सपा का दबदबा रहा है। सपा ने 1996, 2002, 2012 और 2022 में यहां जीत दर्ज की। 2017 में भाजपा के कुशाग्र सागर ने इस सीट पर सेंधमारी करते हुए जीत हासिल की थी। 2022 के चुनाव में यहां मुकाबला बेहद करीबी रहा और सपा के आशुतोष मौर्य (राजू) ने भाजपा उम्मीदवार को महज 1,834 वोटों के मामूली अंतर से हराया। यहां यादव, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मतदाता हार-जीत तय करते हैं।
बदायूं शहर और दातागंज: भाजपा के मजबूत किले
बदायूं शहर विधानसभा सीट पर भाजपा का ऐतिहासिक दबदबा रहा है। भाजपा (जनसंघ सहित) ने यहां 7 से 8 बार जीत का परचम लहराया है। सवर्ण, व्यापारी वर्ग और हिंदू वोटरों के समर्थन से 2017 और 2022 में भाजपा के महेश चंद्र गुप्ता ने लगातार दो बार जीत दर्ज की। 2022 में उन्होंने सपा को 11,179 वोटों से शिकस्त दी थी।
इसी तरह दातागंज सीट भी भाजपा के लिए सुरक्षित मानी जाती है। यहां भी भाजपा 6-7 बार जीत चुकी है। 1991 के बाद से यहां अक्सर एक ही उम्मीदवार के लगातार दो बार जीतने का ट्रेंड रहा है। 2017 और 2022 के चुनाव में भाजपा के राजीव कुमार सिंह (बब्बू भैया) ने लगातार जीत दर्ज कर इस सीट पर पार्टी की पकड़ मजबूत रखी है।
बिल्सी: कोई नहीं बना पाया स्थायी गढ़
बिल्सी विधानसभा सीट का इतिहास काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। कोई भी पार्टी इसे अपना स्थायी गढ़ नहीं बना सकी है। भाजपा और बसपा दोनों ने यहां 4-4 बार जीत दर्ज की है। 1996 में बसपा सुप्रीमो मायावती खुद इस सीट से विधायक चुनी गई थीं। 2017 के बाद से यहां भाजपा का प्रभाव बढ़ा है। 2017 में पंडित राधा कृष्ण शर्मा और 2022 में हरीश चंद्र शाक्य ने भाजपा के टिकट पर जीत दर्ज की। यहां दलित, यादव, मुस्लिम और अन्य ओबीसी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
शेखूपुर: यादव और शाक्य परिवार का वर्चस्व
2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई शेखूपुर सीट पर अब तक केवल तीन चुनाव हुए हैं। इनमें सपा का पलड़ा भारी रहा है। 2012 और 2022 में सपा ने जीत दर्ज की, जबकि 2017 की मोदी लहर में यह सीट भाजपा के खाते में गई थी। 2022 के चुनाव में सपा के हिमांशु यादव ने भाजपा को 6,100 वोटों से हराया। इस सीट पर मुख्य रूप से यादव और शाक्य परिवारों का सियासी वर्चस्व देखने को मिलता है।

