यूपी 2027: विपक्ष की रस्साकशी के बीच मायावती का अकेला दांव

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राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन समीकरण साफ होने लगे हैं। भाजपा अपने सहयोगियों—सुभसपा, आरएलडी, निषाद पार्टी, अपना दल—के साथ हैट्रिक की तैयारी में है। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन की बात तो कर रहे हैं, लेकिन बयानबाजी से रिश्ते में तनाव भी दिख रहा है। इन दोनों बड़े खेमों के बीच मायावती चुपचाप अपना खेल खेल रही हैं।अखिलेश यादव पीडीए की परिभाषा रोज बदल रहे हैं। कभी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक, तो कभी “जो पीड़ित है वो पीडीए”। संदेश साफ है कि वे जितना संभव हो सके सामाजिक विस्तार करना चाहते हैं। कांग्रेस भी अपनी जगह मांग रही है। गठबंधन में बराबरी का सवाल दोनों के बीच खींचतान पैदा कर रहा है। नेता मंच से साथ होने का दावा करते हैं, लेकिन जमीन पर संदेश अभी भी अस्पष्ट है।मायावती की अलग राहमायावती ने साफ कह दिया है कि इस बार कोई गठबंधन नहीं। अकेले चुनाव लड़ेंगी। 2007 वाली सोशल इंजीनियरिंग दोहराने की कोशिश में हैं—दलित के साथ मुस्लिम और ब्राह्मण। 2022 और 2024 में मुस्लिम वोट उन्हें नहीं मिला। ज्यादातर सपा-कांग्रेस गठबंधन के पास चला गया। अब वे फिर से उसी जमीन को वापस पाने की कोशिश में हैं।चंद्रशेखर आजाद पर उनका हालिया हमला भी इसी चिंता को दिखाता है। दलित राजनीति में नई चुनौती को वे नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। बसपा का ग्राफ 2012 के बाद लगातार गिरता रहा है। लोकसभा और विधानसभा में प्रदर्शन कमजोर रहा। राज्यसभा में भी पार्टी शून्य पर पहुंचने वाली है। 2027 उनके लिए सिर्फ चुनाव नहीं, पार्टी की प्रासंगिकता बचाने की लड़ाई है।ओवैसी का ऑफर और मुस्लिम वोट का गणितअसदुद्दीन ओवैसी गैर-भाजपा दलों को गठबंधन का न्योता देते रहे हैं। सपा, कांग्रेस और बसपा सबको। सपा और कांग्रेस के लिए यह न्योता असहज है। अगर मायावती और ओवैसी के बीच कोई समझ बनती है तो मुस्लिम वोटों में बंटवारा हो सकता है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी करीब 19 प्रतिशत है। 2024 में उन्होंने एकमुश्त सपा-कांग्रेस को वोट दिया। अगर यह वोट बंटता है तो सीधा फायदा भाजपा को हो सकता है।अभी ऐसा कोई गठबंधन तय नहीं है। लेकिन संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। मायावती की मजबूरी और ओवैसी की महत्वाकांक्षा दोनों तरफ से दरवाजा खुला रख सकती है।असली तस्वीरयूपी का चुनाव अब सिर्फ भाजपा बनाम सपा-कांग्रेस नहीं रह गया है। तीसरा कारक मायावती हैं। वे जितनी मजबूत दिखेंगी, विपक्षी वोट उतना ही बंटेगा। जितनी कमजोर रहेंगी, सपा-कांग्रेस को एकजुट मुस्लिम-दलित वोट मिलने की संभावना बढ़ेगी।अखिलेश यादव पीडीए के विस्तार से अपना आधार बढ़ाने की कोशिश में हैं। कांग्रेस अपनी जगह मांग रही है। मायावती अकेले अपनी पुरानी ताकत वापस लाने में लगी हैं। ओवैसी किनारे से न्योता देकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। इन सबके बीच भाजपा शांत भाव से अपने गठबंधन को साध रही है। विपक्ष जितना बंटा रहेगा, सत्ताधारी दल के लिए मैदान उतना ही आसान होता जाएगा। 2027 का चुनाव इन्हीं छोटी-छोटी दरारों पर तय हो सकता है। अभी तो सभी अपनी-अपनी तैयारी में हैं। असली परीक्षा तब होगी जब टिकट वितरण शुरू होगा और गठबंधन के आंकड़े अंतिम रूप लेंगे।