तो UP Police को ही खत्म कर दें! SC की फटकार- प्रदेश शासन को भी रगड़ा

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और मनमानी पर देश की सर्वोच्च अदालत ने अब तक की सबसे तीखी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यूपी पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए सख्त लहजे में कहा कि जिस तरह से कानूनी प्रक्रियाओं का मखौल उड़ाया जा रहा है, उसे देखते हुए तो “यूपी पुलिस को भंग ही कर देना चाहिए।”

कोर्ट ने दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि व्यवस्था और कानून के साथ चल रहा यह खिलवाड़ और बकवास अब हर हाल में बंद होना चाहिए। यह पूरा विवाद एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा है, जिसमें पुलिस ने मौके से पकड़े गए आरोपी का नाम खाली छोड़ दिया और बाद में अपनी मर्जी से नाम जोड़ा।

क्या है पूरा मामला, जिस पर भड़का सुप्रीम कोर्ट?

यह मामला एक ऐसी जांच से जुड़ा है जिसमें पुलिस ने एक मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ ‘अज्ञात’ व्यक्ति के नाम से एफआईआर दर्ज की थी। जबकि, शिकायतकर्ता का स्पष्ट कहना था कि उसने आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया था और पुलिस के हवाले कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने अदालत में बताया कि मौके पर पकड़े जाने के बावजूद आरोपी का नाम एफआईआर में दर्ज नहीं किया गया और ‘आरोपी’ वाले कॉलम को खाली छोड़ दिया गया। बाद में, जब हाईकोर्ट ने मामले में स्टेटस रिपोर्ट मांगी, तब जाकर पुलिस ने चार्जशीट में मोटरसाइकिल सवार का नाम शामिल किया, लेकिन हैरान करने वाली बात यह रही कि बाद में उसे क्लीन चिट भी दे दी गई। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि जब मोटरसाइकिल जब्त की गई थी, तब उस पर नंबर प्लेट नहीं थी, लेकिन जांच के दौरान उसमें एक रजिस्ट्रेशन नंबर जोड़ दिया गया।

“समीकरण पक्ष में बन जाए तो क्या अपने व्यक्ति का नाम डाल देंगे?”

पीठ ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल दागे:

  • “अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो उसका नाम अज्ञात क्यों लिखा गया?”

  • “लोग पुलिस पर भरोसा कैसे करेंगे?”

  • “आप आरोपी को मौके पर पकड़ते हैं, लेकिन FIR में उसका नाम नहीं देना चाहते। शायद अगर समीकरण आपके पक्ष में बन जाए तो आप नाम बदल सकते हैं, अपने किसी व्यक्ति का नाम डाल सकते हैं… क्या वहां (यूपी में) इसी तरह काम होता है?”

सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह के ‘कवर-अप’ (मामले को दबाने की कोशिश) पर नाराजगी जताते हुए यूपी पुलिस की ओर से दाखिल जवाबी हलफनामे को “पूरी तरह निराशाजनक” करार दिया।

अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से तलब किया

कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश दिया है। पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिकारी को एक बेहतर हलफनामे के साथ आना होगा और जवाब देना होगा कि मौके पर पकड़े जाने के बावजूद एफआईआर में आरोपी का नाम दर्ज क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने अपनी कार्यशैली नहीं सुधारी, तो अदालत को सख्त कदम उठाने पड़ेंगे, जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर उत्तर प्रदेश शासन की होगी।