राजभर से अनुप्रिया तक, छोटे दलों के बिना क्यों अधूरी दिखती है राजनीति

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े दल अकेले चलने का दावा तो बहुत करते हैं, लेकिन असलियत में उनकी नैया पार लगाने वाले अक्सर छोटे दल ही होते हैं। जातिगत समीकरणों से भरे इस राज्य में कुर्मी, राजभर, निषाद, जाट जैसी जातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले छोटे दल बड़े दलों के लिए बैसाखी का काम करते हैं। वे न सिर्फ वोट ट्रांसफर करते हैं, बल्कि उन इलाकों में सेंध लगाते हैं जहाँ बड़ा दल अकेला कमजोर पड़ता है।
पिछले कई विधानसभा चुनावों को कवर करने के बाद साफ दिखता है कि ये छोटे दल कभी-कभी नतीजे बदल देने की ताकत रखते हैं।
2017 विधानसभा चुनाव: भाजपा की लहर में छोटे दलों का योगदान
2017 में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत हासिल की। पार्टी को अकेले 312 सीटें मिलीं। लेकिन गठबंधन की बात करें तो तस्वीर और मजबूत हो जाती है:
- अपना दल (सोनेलाल): 9 सीटें
- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी): 4 सीटें
- निषाद पार्टी: 1 सीट
एनडीए का कुल आंकड़ा 325 के पार पहुंच गया। अपना दल ने कुर्मी वोटबैंक को भाजपा के पाले में खींचा, खासकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड में। एसबीएसपी ने राजभर समुदाय को साधा। ये सीटें भले संख्या में कम थीं, लेकिन उन्होंने भाजपा को पूर्ण बहुमत के आरामदायक आंकड़े तक पहुंचाने में मदद की। बिना इनके भी भाजपा सरकार बना सकती थी, लेकिन गठबंधन ने सामाजिक विस्तार का संदेश दिया।
2022 विधानसभा चुनाव: दोनों तरफ बैसाखियां काम आईं
2022 में भाजपा की सीटें घटकर 255 रह गईं, लेकिन सहयोगियों ने नैया पार लगाई:
- अपना दल (सोनेलाल): 12 सीटें (2017 के 9 से बढ़ी)
- निषाद पार्टी: 6 सीटें
एनडीए का कुल आंकड़ा 273 पहुंच गया, जो बहुमत (202) से काफी ऊपर था। निषाद पार्टी पूर्वी यूपी के नदी किनारे वाले इलाकों में निषाद-मल्लाह वोट को भाजपा की तरफ मोड़ने में सफल रही।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने भी छोटे दलों का सहारा लिया:
- राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी): 8 सीटें
- सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (एसबीएसपी): 6 सीटें
सपा अकेले 111 सीटें जीती, लेकिन गठबंधन के साथ कुल 125 सीटें हो गईं। पश्चिमी यूपी में आरएलडी का जाट वोट और पूर्वांचल में एसबीएसपी का राजभर वोट सपा के लिए निर्णायक साबित हुआ। कई सीटों पर इन दलों के वोट ट्रांसफर ने मार्जिन तय किया।
छोटे दल कैसे बनते हैं बैसाखी?
- जातिगत वोट का समेकन: यूपी में कोई भी बड़ा दल अकेले सभी जातियों को साध नहीं सकता। छोटा दल अपनी मुख्य जाति को एक तरफ झुका देता है।
- क्षेत्रीय पकड़: आरएलडी पश्चिम में, निषाद पार्टी पूर्व में, अपना दल कुर्मी बहुल इलाकों में मजबूत है। बड़े दल इन क्षेत्रों में अकेले संघर्ष करते हैं।
- वोट ट्रांसफर की क्षमता: गठबंधन में छोटे दल के वोट बड़े दल के उम्मीदवार के खाते में चले जाते हैं। कई सीटों पर 5-15 हजार वोट का अंतर इन्हीं से तय होता है।
- सौदेबाजी की ताकत: छोटे दल सीटों की संख्या बढ़ाकर मंत्री पद या प्रभाव हासिल करते हैं। 2017 में एसबीएसपी भाजपा के साथ थी, 2022 में सपा के साथ चली गई—और दोनों बार सीटें जीतीं।
आंकड़ों से साफ तस्वीर
- 2017 में भाजपा के सहयोगियों ने कुल 14 सीटें दीं।
- 2022 में भाजपा के सहयोगियों ने 18 और सपा के सहयोगियों ने 14 सीटें दीं।
- कई करीबी मुकाबलों में छोटे दलों का वोटबैंक निर्णायक रहा।
यूपी की राजनीति में बड़े दल हाथी हैं, लेकिन नदी पार करने के लिए उन्हें छोटी बैसाखियों की जरूरत पड़ती है। अपना दल, निषाद पार्टी, आरएलडी और एसबीएसपी जैसे दल बार-बार साबित करते हैं कि वे सिर्फ “छोटे” नहीं हैं—वे किंगमेकर हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव में भी ये बैसाखियां फिर से सक्रिय दिखेंगी। जो बड़ा दल इन्हें सही तरीके से साध लेगा, उसकी नैया पार होने की संभावना कहीं ज्यादा होगी।

