कर्बला की त्रासदी के बाद ज़ैनब की बुलंद आवाज़, यज़ीद को याद दिलाया न्याय

वर्ष 680 ईस्वी में कर्बला की जंग में इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत के बाद, हज़रत ज़ैनब ही वह शख्सियत थीं जिन्होंने इस त्रासदी के सच को दुनिया के सामने रखा। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, अगर ज़ैनब ने अपनी आवाज़ नहीं उठाई होती, तो क्रूर शासक यज़ीद और उसकी सेना कर्बला के नरसंहार को हमेशा के लिए छिपा ले जाती और दुनिया कभी इसकी सच्चाई नहीं जान पाती।
कर्बला के बाद जंजीरों में कैद, लेकिन हौसला बुलंद
कर्बला में अपने परिवार को आंखों के सामने शहीद होते देखने के बावजूद ज़ैनब का हौसला नहीं टूटा। शिया ऐतिहासिक परंपराओं और वृत्तांतों के अनुसार, त्रासदी के बाद ज़ैनब और कुछ अन्य जीवित बचे लोगों को जंजीरों में जकड़ कर बंदी बना लिया गया था। उन्हें अलग-अलग जगहों पर ले जाया गया, लेकिन ज़ैनब जहां भी गईं, उन्होंने लोगों को कर्बला की सच्चाई के बारे में खुलकर बताया। उनके साहसिक बयानों के कारण ही पूरे अरब में लोगों को इस भीषण नरसंहार की जानकारी मिली। इनमें विशेष रूप से कुफ़ा और दमिश्क में दिए गए उनके भाषणों को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
यज़ीद के दरबार में ऐतिहासिक और निडर भाषण
दमिश्क में यज़ीद के दरबार में हज़रत ज़ैनब का भाषण इतिहास में प्रमुखता से दर्ज है। जंजीरों में जकड़े होने के बावजूद उन्होंने भरे दरबार में निडरता से सच्चाई का बचाव किया। यज़ीद की जीत के अहंकार को चुनौती देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि सत्ता और ताकत के बल पर सत्य और नैतिकता को कभी नहीं मिटाया जा सकता।
भाषण के दौरान उन्होंने यज़ीद के अपमानजनक शब्दों के बीच उसे टोकते हुए कड़ी फटकार लगाई। ज़ैनब ने इमाम हुसैन को याद किया और पैगंबर मुहम्मद के परिवार का मजबूती से बचाव किया। कुफ़ा के भाषण की तरह ही दमिश्क के उनके इस भाषण में भी कुरान के कई संदर्भ शामिल थे।
‘क्या अपनी औरतों को पर्दे में रखना और पैगंबर की पोती को घुमाना न्याय है?’
उन्होंने यज़ीद से सीधे सवाल किया कि क्या यह न्याय है कि वह अपनी औरतों को कड़े पहरे और पर्दे में सुरक्षित रखे, जबकि पैगंबर की पोती को सड़कों पर घुमाया जाए। ज़ैनब ने दरबार में ऐलान किया कि यज़ीद की जीत केवल अस्थायी है, उसके प्रयास व्यर्थ हैं और इस कृत्य के लिए उसकी शर्म शाश्वत रहेगी।
इतिहासकार मानते हैं कि हज़रत ज़ैनब का जीवन और उनका संघर्ष आज भी प्रासंगिक है। उन्हें सम्मान देने का वास्तविक अर्थ मजलूमों (उत्पीड़ितों) के हक में बोलना, मानवीय गरिमा की रक्षा करना और किसी भी तानाशाह के सामने झुकने से इनकार करना है।

