वाराणसी से 2027 का संदेश, क्या निशांत बनेंगे JDU का नया चेहरा?

nitish kumar
Ajay Gupta
Ajay Gupta

बिहार की राजनीति में दशकों से केंद्रीय भूमिका निभाने वाली जनता दल (यूनाइटेड) अब उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में अपनी जड़ें मजबूत करने की तैयारी में जुट गई है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने अपनी रणनीति को धार देनी शुरू कर दी है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे ज्यादा चर्चा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार की हो रही है, जिनकी उत्तर प्रदेश के वाराणसी में सक्रियता ने पार्टी के भीतर नए राजनीतिक समीकरणों की सुगबुगाहट तेज कर दी है।

वाराणसी से दिया गया बड़ा राजनीतिक संदेश

हाल ही में वाराणसी में आयोजित एक पार्टी कार्यक्रम में निशांत कुमार की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि जेडीयू उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए गंभीर है। उन्होंने अपने दौरे के दौरान कहा कि पार्टी आगामी 2027 का विधानसभा चुनाव एनडीए के साथ मिलकर लड़ने का प्रयास करेगी। इसके साथ ही उन्होंने बिहार में नीतीश कुमार के शासन मॉडल और उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के विकास मॉडल को आपस में जोड़कर आगे बढ़ने की बात भी सामने रखी।

उत्तर प्रदेश में पुराना चुनावी इतिहास

यूपी के राजनीतिक गलियारों में जेडीयू के लिए यह कोई नया प्रयोग नहीं है। पार्टी ने इससे पहले भी कई बार अपनी किस्मत आजमाई है। वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 16 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और दो सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 2007 में भी 16 सीटों पर चुनाव लड़कर एक सीट हासिल की थी। हालांकि, 2012 के चुनाव में पार्टी ने 219 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए, लेकिन एक भी सीट पर सफलता नहीं मिल सकी। इसके बाद 2017 के चुनाव में जेडीयू ने यूपी के मैदान से दूरी बनाए रखी थी।

सीट बंटवारे और एनडीए के समीकरण की चुनौती

उत्तर प्रदेश में जेडीयू के सामने अतीत में सबसे बड़ी बाधा सीटों के तालमेल को लेकर रही है। वर्ष 2007 के चुनाव में बीजेपी और जेडीयू साथ मिलकर उतरे थे, लेकिन 2012 में सीटों के बंटवारे पर सहमति नहीं बन पाई थी। उस दौरान बीजेपी का रुख था कि उत्तर प्रदेश में जेडीयू का जनाधार सीमित है, जबकि जेडीयू अधिक राजनीतिक हिस्सेदारी चाहती थी। बात न बनने पर दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरे। इसके बाद 2013 में नरेंद्र मोदी को बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का चेहरा घोषित किए जाने के बाद नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होने का फैसला किया था।

भविष्य की राजनीति और निशांत की परीक्षा

अब एक बार फिर पार्टी उत्तर प्रदेश में नए सिरे से अवसर तलाश रही है। जेडीयू का मानना है कि बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के बीच साझा सामाजिक ताना-बाना उसके लिए एक राजनीतिक जमीन तैयार कर सकता है। इसी सोची-समझती रणनीति के तहत निशांत कुमार को फ्रंट फुट पर लाया जा रहा है। हालांकि फिलहाल पार्टी की कमान और दिशा तय करने में नीतीश कुमार ही सबसे बड़े चेहरे हैं, लेकिन निशांत को बिहार से बाहर इस तरह की बड़ी जिम्मेदारी सौंपना इस बात का संकेत जरूर देता है कि पार्टी भविष्य की लीडरशिप की तैयारी में जुट गई है। आने वाला 2027 का चुनाव न केवल जेडीयू के सांगठनिक विस्तार की कसौटी होगा, बल्कि इसे निशांत कुमार के राजनीतिक भविष्य की बड़ी परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।