क्या मायावती और आकाश आनंद के बीच सिर्फ जनरेशन गैप का है टकराव?

mayawati
आशीष शर्मा ऋषि
आशीष शर्मा ऋषि

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) में एक बार फिर वही कहानी दोहराई गई है—आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी मिली, फिर छीनी गई, वापसी हुई और अब बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। मायावती का संदेश सतह पर बिल्कुल साफ है, बसपा में परिवार से बड़ा पार्टी मिशन है। लेकिन क्या यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ ‘परिवार बनाम संगठन’ की लड़ाई है? गहराई से देखने पर पता चलता है कि असली टकराव शायद मायावती के ‘कंट्रोल’ और आकाश आनंद के नए ‘अपडेटेड’ राजनीतिक तौर-तरीकों के बीच का है।

बुआ का ‘कैडर’ बनाम भतीजे का ‘डिजिटल ड्राफ्ट’

कांशीराम के दौर से ही बसपा की राजनीति ‘किताब सिस्टम’, कैडर, बंद कमरों की बैठकों और कड़े अनुशासन पर आधारित रही है। मायावती ने इसी मॉडल को दशकों तक सफलतापूर्वक चलाया, जहां नेता कम बोलता है और संगठन ज्यादा।

दूसरी तरफ, आकाश आनंद की शैली बिल्कुल अलग थी। वे सोशल मीडिया की उस युवा पीढ़ी को टारगेट कर रहे थे जो लंबे भाषणों से ज्यादा एक्स (X), इंस्टाग्राम और यूट्यूब के छोटे वीडियो में राजनीति तलाशती है। उनकी आक्रामक बयानबाजी और नई राजनीतिक ब्रांडिंग पुरानी पीढ़ी के नेताओं को रास नहीं आ रही थी। सीधे शब्दों में कहें तो—बसपा में आकाश ने ‘अपडेट’ का बटन दबाया, लेकिन सिस्टम ने जवाब दिया: “पहले बुआ से पूछिए!”

क्लाइमैक्स में ससुर का संन्यास, फिर भी कुर्सी नहीं मिली

इस बार की पटकथा में आकाश के ससुर अशोक सिद्धार्थ का भी अहम रोल रहा। मायावती ने संकेत दिया था कि यदि सिद्धार्थ सक्रिय राजनीति से हटते हैं, तो आकाश के भविष्य पर विचार होगा। 10 सितंबर को सिद्धार्थ ने संन्यास का ऐलान भी कर दिया, लेकिन राजनीति का ट्विस्ट देखिए—शर्त पूरी हुई, ससुर ने राजनीति छोड़ी, पर दामाद की कुर्सी वापस नहीं आई। मायावती ने आकाश को ‘डबल माइंडेड’ बताकर फिर किनारे कर दिया।

क्या है ‘बुआ मॉडल’ का अगला कदम?

आकाश को बाहर करने का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बसपा में अंतिम लाइन आज भी मायावती ही खींचती हैं। हालांकि, आकाश के छोटे भाई ईशान आनंद को संगठन में जगह मिलने से यह साफ है कि परिवार की अगली पीढ़ी पूरी तरह राजनीति से बाहर नहीं हुई है। यानी बसपा में नई पीढ़ी आएगी जरूर, लेकिन एंट्री ‘बुआ की शर्तों’ पर ही होगी।

2027 में होगी असली परीक्षा

मायावती ने अपने इस कदम से पुराने कैडर को यह जता दिया है कि पार्टी किसी गुट या व्यक्ति के प्रभाव में नहीं है। लेकिन चुनावी राजनीति में असली परीक्षा नियंत्रण की नहीं, वोटों की होती है। अगर इस फैसले से मायावती अपना छिटका हुआ पारंपरिक दलित वोट बैंक वापस ला पाती हैं, तो उनका पुराना मॉडल सफल कहलाएगा। लेकिन अगर युवा और डिजिटल मतदाता बसपा से और दूर छिटक गए, तो सवाल उठेगा कि पार्टी ने अपना पुराना स्वरूप बचाया है या अपने भविष्य को ही पीछे छोड़ दिया।

फिलहाल बसपा के सामने सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि वह बदलना चाहती है; संकट यह है कि पार्टी तय ही नहीं कर पा रही कि उसे ‘अपडेट’ होना है या नहीं।