Starlink की लॉन्चिंग क्यों अटकी? एलन मस्क ने ‘Oligarchs’ पर साधा निशाना

टेस्ला (Tesla) और स्पेसएक्स (SpaceX) के प्रमुख एलन मस्क (Elon Musk) ने बुधवार को एक बड़ा और सनसनीखेज आरोप लगाया है। मस्क ने दावा किया है कि कुछ शक्तिशाली उद्योगपति (ओलिगार्क्स) भारत में उनकी सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस ‘स्टारलिंक’ (Starlink) की एंट्री में जानबूझकर रुकावटें डाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये लोग देश के नागरिकों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। मस्क ने सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस के भारत में लॉन्च होने में आ रही अड़चनों की तीखी आलोचना की है।
‘यह भारत के लोगों के खिलाफ अपराध है’
एलन मस्क ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट में कहा, “दुर्भाग्य से कुछ ताकतवर उद्योगपति भारतीय लोगों पर अपनी एकाधिकार वाली पकड़ बनाए रखने के लिए हमें रोक रहे हैं। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि वे कौन हैं…”
टेस्ला सीईओ ने आगे लिखा, “यह भारत के लोगों के खिलाफ एक अपराध है!” हालांकि, मस्क ने अपनी पोस्ट में किसी भी व्यक्ति या कंपनी का नाम स्पष्ट रूप से नहीं लिया, जिन पर उन्होंने स्टारलिंक की एंट्री को रोकने का आरोप लगाया है।

स्टारलिंक ने फिर शुरू की हैं भारत में एंट्री की कोशिशें
मस्क की यह कड़ी प्रतिक्रिया स्टारलिंक द्वारा भारत में अपनी सेवाएं शुरू करने की कोशिशों को दोबारा तेज करने के लगभग एक महीने बाद आई है।
हाल ही में आई कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 20 अगस्त को स्टारलिंक ने अपने ‘Gen 2’ सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन (सैटेलाइटों के समूह) की मंजूरी के लिए इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड ऑथराइजेशन सेंटर (IN-SPACe) के पास फिर से आवेदन जमा किया है। यह एप्लीकेशन लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में 340-615 किमी की ऊंचाई पर काम करने वाले कॉन्स्टेलेशन के लिए है, जिसमें ‘डायरेक्ट-टू-डिवाइस’ (D2D) कनेक्टिविटी जैसी नई क्षमताएं भी शामिल हैं।
पहले खारिज हो चुका है स्टारलिंक का एप्लीकेशन
इससे पहले, IN-SPACe ने कुछ खास फीचर्स और स्पेक्ट्रम बैंड के नियमों का पालन न करने के कारण स्टारलिंक के प्रस्तावित 30,000-सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन के एप्लीकेशन को खारिज कर दिया था। इसके बाद रेगुलेटर ने जुलाई 2025 में स्टारलिंक के ‘Gen 1’ कॉन्स्टेलेशन (जिसमें 4,408 सैटेलाइट शामिल थे) को मंजूरी दी थी। स्टारलिंक का नया आवेदन ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार सैटेलाइट कम्युनिकेशन के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क पर काम कर रही है।
क्या हैं रेगुलेटरी अड़चनें?
भारत में सैटेलाइट सर्विस शुरू करने से पहले ऑपरेटरों को IN-SPACe से मंजूरी लेनी होती है। वर्तमान में, सिक्योरिटी क्लीयरेंस और स्पेक्ट्रम अलॉटमेंट जैसे मुद्दों के कारण कमर्शियल सैटेलाइट सेवाएं अभी तक पूरी तरह से शुरू नहीं हो पाई हैं। दूरसंचार नियामक ट्राई (TRAI) ने सैटेलाइट स्पेक्ट्रम की कीमत को लेकर सुझाव दे दिए हैं, लेकिन सरकार ने अभी अंतिम फैसला नहीं लिया है।
ट्राई ‘D2D’ सर्विस की भी जांच कर रहा है, जिससे सैटेलाइट नेटवर्क सीधे कंज्यूमर डिवाइस (मोबाइल फोन) तक कनेक्टिविटी पहुंचा सकेंगे। यह D2D तकनीक पारंपरिक टेलीकॉम ऑपरेटरों के लिए चिंता का विषय बन गई है, जिनका तर्क है कि सैटेलाइट कंपनियों पर भी उनके जैसी ही रेगुलेटरी शर्तें लागू होनी चाहिए।
भारत में किससे है स्टारलिंक का मुकाबला?
भारत के उभरते सैटेलाइट कम्युनिकेशन मार्केट में स्टारलिंक का सीधा मुकाबला रिलायंस जियो (Reliance Jio) के प्रस्तावित लो अर्थ ऑर्बिट कॉन्स्टेलेशन, अमेजन कुइपर (Amazon Kuiper), और यूटेलसैट वनवेब (Eutelsat OneWeb) जैसी कंपनियों से है।
SpaceX की योजना दुनिया भर में लगभग 42,000 सैटेलाइट का एक विशाल ‘Gen 2’ कॉन्स्टेलेशन बनाने की है, जबकि भारत के लिए उसकी मौजूदा एप्लीकेशन में लगभग 30,000 सैटेलाइट के लिए मंजूरी मांगी गई है।

