क्या फांसी से रुकते हैं रेप? 25 देशों के आंकड़े और भारत की हकीकत

जब भी कोई वीभत्स यौन अपराध सामने आता है, तो समाज और जनमानस से एक ही मांग सबसे पहले उठती है—’बलात्कारी को सीधे फांसी दी जाए।’ लेकिन क्या कानून की किताबों में मौत की सजा लिख देने भर से ऐसे अपराध रुक जाते हैं? दुनिया के उन देशों के आंकड़े क्या कहते हैं जहां रेप पर मृत्युदंड का प्रावधान है? संयुक्त राष्ट्र (UNODC), यूनिसेफ (UNICEF) और अंतरराष्ट्रीय अपराध वैज्ञानिकों के अध्ययन एक बिल्कुल उलट और चौंकाने वाली जमीनी तस्वीर पेश करते हैं।
दुनिया के 25 देशों में फांसी, फिर भी नहीं थमे अपराध
मौजूदा समय में दुनिया के कम से कम 25 देशों में रेप या रेप के बाद हत्या के मामलों में मौत की सजा (Capital Punishment) का कानूनी प्रावधान है। इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश, सऊदी अरब, ईरान, इराक, चीन, मिस्र और नाइजीरिया जैसे देश शामिल हैं। हालांकि, UNODC और UNICEF के 2019-2024 के आंकड़े बताते हैं कि जिन मुल्कों में मौत की सजा लागू है, वहां महिलाओं या बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा की दर उन देशों के मुकाबले रत्ती भर भी कम नहीं है, जहां मौत की सजा नहीं दी जाती।
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पाकिस्तान: साल 2023 में पाकिस्तान में 7,010 रेप के मामले दर्ज किए गए, लेकिन वहां कन्विक्शन रेट (दोषसिद्धि की दर) 3 प्रतिशत से भी कम रही।
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सऊदी अरब: यहां दर्ज मामलों की दर भले ही कागजों पर 0.09 प्रति लाख दिखे, लेकिन इसकी मुख्य वजह कठोर सामाजिक पाबंदियां और पीड़िता पर ही लांछन या कानूनी कार्रवाई का खतरा होना है, जिससे अधिकांश मामले कभी पुलिस तक पहुंचते ही नहीं।
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ईरान: एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार, करीब 5.9 प्रतिशत ईरानी महिलाओं ने अपने जीवनकाल में कभी न कभी यौन हिंसा का सामना किया है।
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चीन: साल 2023 में चीन में 42,458 रेप केस दर्ज हुए, जो 1996 के बाद का सबसे बड़ा आंकड़ा है।
भारत का हाल: 24.4% कन्विक्शन रेट और 2 लाख से ज्यादा पेंडिंग केस
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में साल 2024 के दौरान 29,536 रेप के मामले दर्ज किए गए। यानी देश में औसतन हर 18 मिनट में एक रेप की रिपोर्ट दर्ज हुई।
कानून में कठोर प्रावधानों के बावजूद सबसे चिंताजनक पहलू कन्विक्शन रेट का है। भारत में रेप केस में दोषसिद्धि की दर महज 24.4 प्रतिशत है। इतना ही नहीं, 2024 के अंत तक देश की अदालतों में 2,06,777 रेप केस केवल ट्रायल (सुनवाई) के इंतजार में लंबित पड़े थे। यह स्थिति दर्शाती है कि जब अपराधी को यह आभास होता है कि जांच, साक्ष्य और लंबी न्यायिक प्रक्रिया के चलते उसके पकड़े जाने या सजा पाने की संभावना बेहद कम है, तो कानून में लिखी सजा कितनी भी कठोर हो, उसका डर खत्म हो जाता है।
क्या मौत की सजा अपराध रोकने में असरदार है?
अपराध शास्त्र (Criminology) के दशकों के अध्ययन इस बात को पूरी तरह खारिज करते हैं कि मौत की सजा का कोई बड़ा डिटरेंट इफेक्ट (निवारक प्रभाव) होता है।
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अमेरिका की नेशनल रिसर्च काउंसिल (2012) और यूरोपियन सोसाइटी ऑफ क्रिमिनोलॉजी (2020) की रिपोर्ट्स में साफ हुआ कि कैपिटल पनिशमेंट से सेक्सुअल अपराधों पर कोई प्रभावी रोक नहीं लगती।
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विलियम बेली (1991) के ऐतिहासिक अध्ययन में भी पाया गया था कि मौत की सजा का असर रेप, डकैती या गंभीर हमलों जैसी वारदातों की कमी पर नहीं पड़ता।
अपराध विशेषज्ञों के मुताबिक, अपराध को रोकने वाली सबसे प्रभावी ताकत ‘सजा की कठोरता’ नहीं, बल्कि ‘सजा की निश्चितता और रफ्तार’ (Certainty and Swiftness of Punishment) होती है। जब किसी अपराधी के मन में यह तय हो कि वह पकड़ा ही जाएगा, उसका ट्रायल बिना देरी के पूरा होगा और उसे जेल जाना ही पड़ेगा, तभी कानून का वास्तविक भय पैदा होता है।
तालिबानी मॉडल का सच
अफगानिस्तान में तालिबान के शासन में रेप पर मौत की सजा का प्रावधान है, लेकिन इसके बावजूद महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। तालिबान के नए नियमों में ‘ताजीर बिल मौत’ (अदालती विवेक पर मौत की सजा) का प्रावधान तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल अक्सर ‘जिना’ (विवाहेतर संबंध) के आरोपों में किया जाता है, जहां खुद पीड़िता को ही दोषी ठहराकर सजा का शिकार बना दिया जाता है।
न्याय की गति और कन्विक्शन ही वास्तविक समाधान
अदालती टिप्पणियों और वैश्विक आंकड़ों का सीधा निष्कर्ष यही है कि केवल कानून को कड़ा कर देना या मौत की सजा का ऐलान कर देना किसी भी अपराध का जादुई इलाज नहीं है। मौत की सजा जनता को एक तात्कालिक भावनात्मक संतोष जरूर दे सकती है, लेकिन जब तक पुलिस की फोरेंसिक जांच, फास्ट-ट्रैक कोर्ट और 24.4% के कमजोर कन्विक्शन रेट को सुधारा नहीं जाएगा, तब तक अपराधियों के हौसले पस्त करना मुमकिन नहीं होगा।

