ढाका में जगन्नाथ यूनिवर्सिटी है, लेकिन वहां हिंदू भावनाओं की कोई जगह नहीं

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ASHISH SHARMA RISHI
ASHISH SHARMA RISHI

बांग्लादेश की राजधानी ढाका में जगन्नाथ विश्वविद्यालय। नाम सुनते ही दिमाग में भगवान जगन्नाथ का मंदिर और हिंदू परंपराएं आती हैं। लेकिन हाल के दिनों में जो कुछ वहां हुआ, वह सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि अल्पसंख्यक हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं पर जानबूझकर किया गया प्रहार है। और यह सब नवरात्रि-दुर्गापूजा के पवित्र दिनों में।

12 अक्टूबर की शाम। इस्लामिक इतिहास और संस्कृति विभाग के 17वें बैच के छात्रों ने कैंपस के मुक्तमंच के पास बीफ खिचड़ी पकाने का आयोजन किया। जगह चुनी गई मुख्य मंदिर के ठीक सामने। कुछ रिपोर्टों के अनुसार मंदिर की ईंटें तक चूल्हा बनाने में इस्तेमाल हुईं। हिंदू छात्रों ने आपत्ति जताई। जॉय साहा जैसे मंदिर प्रबंधन समिति के सदस्यों ने साफ कहा—मंदिर के इतने करीब गोमांस पकाने से हमारी धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं। इसे कहीं और ले जाइए।

बहस तेज हुई। आयोजकों का रुख उकसावे वाला रहा। प्रॉक्टर के हस्तक्षेप से खाना थोड़ा दूर शिफ्ट किया गया। हिंदू छात्रों ने जुलूस निकाला। मामला सोशल मीडिया पर फैल गया। प्रशासन ने पहले पशु बलि पर रोक लगाने का नोटिस जारी किया। फिर दबाव में अपना रुख बदला। नतीजा? छात्रों ने बड़े पैमाने पर बीफ भोज का ऐलान कर दिया। गाय खरीदी गई, चंदा जमा किया गया, बांग्लादेश छात्र मजलिस जैसी संगठनों ने गाय देने का वादा किया। और शुक्रवार को कैंपस में गाय काटकर दावत हुई—दुर्गापूजा की शुरुआत के दिनों में।

मंदिर समिति के प्रतिनिधियों ने बार-बार स्पष्ट किया कि वे कैंपस में बीफ खाने या गाय काटने पर पूरी रोक नहीं चाहते। उनकी मांग सिर्फ इतनी थी—मंदिर के सामने न हो, पवित्रता भंग न हो। लेकिन जवाब में भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी नारे लगे।

यह कोई अचानक हुआ वाकया नहीं। जगन्नाथ विश्वविद्यालय की स्थापना 1858 में दीनानाथ सेन, प्रभातीचरण रॉय जैसे हिंदू समाज सुधारकों ने ‘ढाका ब्रह्म स्कूल’ के रूप में की थी। 1872 में बलियादी के जमींदार किशोरीलाल चौधरी ने अपने पिता के नाम पर इसे जगन्नाथ स्कूल नाम दिया। 2005 में यह विश्वविद्यालय बना। यानी संस्था की जड़ें हिंदू परंपरा और दानशीलता में हैं। लेकिन आज उसी कैंपस में मंदिर के सामने गोमांस का तमाशा।

अब सवाल उन भारतीय ‘सेकुलरों’ से है, जो दुनिया भर के मुद्दों पर नाक घुसाए रखते हैं। फिलिस्तीन से लेकर यूरोप तक, अफ्रीका से लेकर अमेरिका तक—जहां कहीं भी मुस्लिम या किसी ‘उत्पीड़ित’ समुदाय का मुद्दा हो, ये लोग तुरंत बयानबाजी शुरू कर देते हैं। “धार्मिक स्वतंत्रता”, “बहुसंख्यकवाद”, “मानवाधिकार” के नारे लगाते हैं। लेकिन जब बांग्लादेश में हिंदू मंदिर के पास गोमांस पकाया जाए, दुर्गापूजा के दौरान गाय काटी जाए, हिंदू छात्रों की भावनाएं ठेस पहुंचाई जाएं—तो इनकी जुबान पर ताला लग जाता है।

ये वही लोग हैं जो भारत में गौरक्षा या मंदिर-मस्जिद विवाद पर घंटों टीवी डिबेट करते हैं, “हिंदू कट्टरता” का रोना रोते हैं। लेकिन पड़ोसी मुस्लिम-बहुल देश में हिंदू अल्पसंख्यकों की धार्मिक भावनाओं का अपमान होने पर चुप्पी साध लेते हैं। क्या सेकुलरिज्म सिर्फ एकतरफा होता है? क्या हिंदू भावनाएं सिर्फ भारत में ही “संवेदनशील” मानी जाती हैं, बाकी जगह नहीं?

बांग्लादेश में हिंदू आबादी लगातार घट रही है। मंदिरों पर हमले, अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा—ये कोई नई बात नहीं। ऐसे में विश्वविद्यालय जैसे शिक्षण संस्थान में यह घटना सिर्फ “खाना पकाने की आजादी” का मुद्दा नहीं। यह बहुसंख्यक समुदाय की ताकत का प्रदर्शन है, अल्पसंख्यकों को याद दिलाने का तरीका है कि उनकी जगह कहां है।

जॉय साहा ने सही कहा—“अगर गाय काटना है तो काटें, लेकिन मंदिर के सामने नहीं।” यह सम्मान की मांग थी। लेकिन जवाब में विरोध को “आजादी पर हमला” बताकर और बड़े स्तर पर दावत का आयोजन किया गया। प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है—पहले रोक, फिर पीछे हटना।

भारतीय सेकुलर बुद्धिजीवी अगर सच में धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के पैरोकार हैं, तो उन्हें इस घटना पर भी उतनी ही आवाज उठानी चाहिए जितनी वे अन्य वैश्विक मुद्दों पर उठाते हैं। नहीं तो उनकी सेकुलरिज्म की दुहाई सिर्फ सस्ती राजनीति और चुनिंदा नैतिकता का प्रदर्शन रह जाएगी।

जगन्नाथ विश्वविद्यालय का नाम जगन्नाथ है। लेकिन वहां जगन्नाथ की भावनाओं का सम्मान हो, यह सुनिश्चित करना बांग्लादेश के प्रशासन और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। और भारतीय सेकुलरों की भी—अगर वे सच में निष्पक्ष हैं तो।