ट्रंप के खिलाफ खुलेंगे मोर्चे, क्या डेमोक्रेट्स रोक पाएंगे राष्ट्रपति की ताकत?

अमेरिका के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों ने वाशिंगटन की सियासत का पूरा समीकरण पलट कर रख दिया है। इन चुनावों में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। चुनाव नतीजों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भले ही ट्रंप राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे, लेकिन उनके पास अब रिपब्लिकन बहुमत वाली कांग्रेस (संसद) का वह समर्थन नहीं होगा, जो उनकी विधायी प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है। डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया है।
NPR के चुनावी विश्लेषण के मुताबिक, ये नतीजे वाशिंगटन के राजनीतिक सत्ता ढांचे में एक “मौलिक बदलाव” को दर्शाते हैं। चुनाव के दौरान ईरान युद्ध एक बड़ा मुद्दा था, लेकिन सबसे अहम भूमिका आर्थिक चिंताओं ने निभाई। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार अर्थव्यवस्था, महंगाई और रोजमर्रा के बढ़ते खर्चों ने मतदाताओं की नाराजगी को सबसे ज्यादा हवा दी।
डेमोक्रेट्स ने ढहाए रिपब्लिकन के मजबूत किले
चुनाव का सबसे नाटकीय और चौंकाने वाला पहलू डेमोक्रेट्स का उन राज्यों में जीत हासिल करना रहा, जिन्हें पारंपरिक रूप से रिपब्लिकन और ट्रंप का मजबूत गढ़ माना जाता था। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन पार्टी से 7 अहम सीनेट सीटें छीन ली हैं।
इन राज्यों में हुआ उलटफेर:
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टेक्सास: डेमोक्रेट उम्मीदवार जेम्स तालारिको ने जीत दर्ज की। 1988 के बाद टेक्सास में सीनेट की यह पहली डेमोक्रेटिक जीत है।
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कंसास: एडम हैमिल्टन ने जीत हासिल की। 1932 के बाद वह यहां से चुने गए पहले डेमोक्रेटिक सीनेटर हैं।
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साउथ कैरोलिना: एनी एंड्रयूज ने बाजी मारी। 1998 के बाद यहां डेमोक्रेट्स की यह पहली सीनेट जीत है।
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आयोवा: जोश ट्यूरेक ने रिपब्लिकन के इस बड़े गढ़ में उलटफेर कर दिया।
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मेन: ट्रॉय जैक्सन ने लंबे समय से रिपब्लिकन सीनेटर रहीं सुसान कॉलिन्स को हरा दिया।
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नॉर्थ कैरोलिना: रॉय कूपर ने रिपब्लिकन के कब्जे वाली सीट छीन ली।
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ओहियो: पूर्व सीनेटर शेरोड ब्राउन ने वापसी करते हुए जीत दर्ज की।
सर्वे में ट्रंप की घटती लोकप्रियता और आर्थिक चिंताएं
द वाशिंगटन पोस्ट के लिए NORC और अन्य रिसर्च पार्टनर्स द्वारा 90,000 से अधिक मतदाताओं के बीच कराए गए राष्ट्रव्यापी सर्वे ने कई अहम खुलासे किए। सर्वे के मुताबिक, ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग गिरकर लगभग 39% पर आ गई है, जबकि 61% मतदाता उनके काम से नाखुश हैं। करीब 50% से अधिक मतदाताओं ने अर्थव्यवस्था और नौकरियों को अपनी मुख्य चिंता बताया। 10 में से लगभग नौ मतदाताओं के लिए बढ़ती महंगाई (Cost of living) वोट देने का सबसे बड़ा कारण रहा। सर्वे में 80% लोगों ने स्वीकार किया कि महंगाई के कारण उन्हें भारी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
ईरान युद्ध को लेकर भी मतदाताओं में नाराजगी दिखी। लगभग 60% लोगों का मानना था कि ईरान पर हमला करने का अमेरिकी फैसला गलत था। एक तिहाई से ज्यादा लोगों ने इसे अपने वोट के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा माना।
डेमोक्रेट्स का एजेंडा: अब ट्रंप के खिलाफ खुलेंगे मोर्चे
अमेरिकी राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ट्रंप के बाकी कार्यकाल के दौरान डेमोक्रेट्स पांच मुख्य मोर्चों पर अपना ध्यान केंद्रित करेंगे:
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संसदीय जांच: डेमोक्रेटिक समितियों को अब पूछताछ (सबपोना) के अधिकार मिल जाएंगे। इसके जरिए वे ट्रंप के आचरण, सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स, विवादों और ईरान युद्ध से जुड़े फैसलों की जांच कर सकते हैं।
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हेल्थकेयर: डेमोक्रेट्स अफोर्डेबल केयर एक्ट के तहत प्रीमियम सब्सिडी को बहाल करने और ट्रंप सरकार द्वारा मेडिकेड में की गई कटौतियों को पलटने की कोशिश करेंगे।
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महंगाई: स्वास्थ्य सेवाओं की लागत, रोजमर्रा के खर्चे और टैक्स ढांचे को लेकर नए प्रस्ताव लाए जाने की उम्मीद है।
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इमिग्रेशन और जवाबदेही: फेडरल इमिग्रेशन कानून लागू करने के तरीके और राष्ट्रपति के कार्यकारी अधिकारों के इस्तेमाल की कड़ी समीक्षा की जाएगी।
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विदेश नीति और ईरान: सैन्य खर्च और विदेशी रणनीति को लेकर डेमोक्रेट्स प्रशासन से सीधा जवाब तलब करेंगे।
क्या डेमोक्रेट्स सच में ट्रंप को रोक पाएंगे?
यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कांग्रेस पर कब्जे के बाद डेमोक्रेट्स पूरी तरह से ट्रंप पर लगाम लगा सकते हैं? जवाब है—पूरी तरह से नहीं। अमेरिकी संविधान राष्ट्रपति को विदेश नीति और कार्यकारी प्रशासन में महत्वपूर्ण स्वतंत्र अधिकार देता है। ट्रंप के पास अब भी ‘वीटो’ पावर सुरक्षित है। किसी भी वीटो को पलटने के लिए डेमोक्रेट्स को रिपब्लिकन समर्थन की दरकार होगी।
इसके अलावा, सीनेट में प्रमुख विधेयकों को पारित कराने के लिए 60 वोटों की जरूरत होती है। इसलिए महाभियोग जैसी किसी भी बड़ी कार्यवाही या कानून बनाने के लिए दोनों पार्टियों का साथ आना जरूरी होगा। हालांकि, यह तय है कि अब ट्रंप को फैसले लेने में पहले से कहीं ज्यादा अड़चनों का सामना करना पड़ेगा।
रिपब्लिकन पार्टी के सामने नेतृत्व का संकट
इन नतीजों ने रिपब्लिकन पार्टी और उस पर ट्रंप के प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 2024 में ट्रंप का समर्थन रिपब्लिकन उम्मीदवारों के लिए सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, लेकिन इस बार उनके समर्थन वाले कई बड़े उम्मीदवार हार गए।
सदन में बहुमत छिनने के बाद हाउस स्पीकर माइक जॉनसन की स्थिति कमजोर हो गई है, जबकि डेमोक्रेट्स की ओर से हकीम जेफरीज का नया स्पीकर बनना तय माना जा रहा है। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या पार्टी को ट्रंप की रणनीतियों पर ही चलना चाहिए, या 2028 के चुनाव को देखते हुए किसी नए नेतृत्व (खासकर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की भूमिका) की ओर कदम बढ़ाना चाहिए।

