प्राइवेट स्कूलों की फीस पर सख्ती, 18 मानकों के बिना नहीं बढ़ा सकेंगे फीस

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए लगातार महंगा होता जा रहा है। हालिया आंकड़ों और रिपोर्टों के अनुसार, पिछले दो दशकों (20 साल) में दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों की फीस में औसतन 150 से 300 प्रतिशत तक का भारी इजाफा दर्ज किया गया है। कई बड़े और प्रतिष्ठित स्कूलों में यह बढ़ोतरी इससे भी कहीं अधिक है। ट्यूशन फीस के साथ-साथ अन्य शुल्कों में हुई इस बेतहाशा वृद्धि ने अभिभावकों के घरेलू बजट पर सीधा असर डाला है।
20 साल में कितना बदला फीस का ढांचा?
साल 2005-2006 के दौरान जहां एक सामान्य प्राइवेट स्कूल की मासिक फीस 1,500 से 2,500 रुपये के आसपास हुआ करती थी, वहीं अब यह बढ़कर 6,000 से 15,000 रुपये प्रति माह के पार पहुंच चुकी है।
अभिभावकों पर यह बोझ केवल ट्यूशन फीस तक सीमित नहीं है। स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले एडमिशन फीस, डेवलपमेंट चार्ज, एनुअल चार्ज और ट्रांसपोर्ट (बस व वैन) के किराए में भी पिछले वर्षों के दौरान कई गुना वृद्धि हुई है। पिछले 10 से 20 वर्षों के रुझानों को देखें तो शिक्षा का खर्च लगातार ऊपर गया है।
10 में से 8 अभिभावक फीस बढ़ोतरी से परेशान: सर्वे
हर नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही फीस वृद्धि का मुद्दा प्रमुखता से उठता है। कम्युनिटी प्लेटफॉर्म ‘लोकलसर्कल्स’ (LocalCircles) और अन्य फोरम के सर्वेक्षणों के अनुसार, 10 में से 8 अभिभावक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि स्कूलों ने वर्तमान सत्र में 10 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाई है।
दिल्ली जैसे महानगरों के कुछ चुनिंदा स्कूलों में तो फीस बढ़ोतरी की यह दर 25 से 30 प्रतिशत तक दर्ज की गई है। अभिभावकों का कहना है कि उनकी सालाना आय जिस रफ्तार से बढ़ती है, उसकी तुलना में स्कूल की फीस, किताबें, यूनिफॉर्म और वैन के खर्च कहीं तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे कुल पारिवारिक आमदनी का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ एक बच्चे की पढ़ाई पर खर्च हो रहा है।
दिल्ली हाईकोर्ट का रुख: अधिकार सुरक्षित, पर मुनाफाखोरी बर्दाश्त नहीं
फीस निर्धारण का मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रियाओं में भी उलझा रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया था कि निजी स्कूलों को अपनी फीस तय करने का प्रशासनिक अधिकार है, लेकिन यह पूरी तरह से पारदर्शी और स्थापित नियमों के अनुरूप होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि सरकार को स्कूलों के प्रशासनिक अधिकारों में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही यह शर्त भी जोड़ी कि किसी भी सूरत में मनमानी या मुनाफाखोरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
1,700 स्कूलों पर लागू हुए 18 कड़े मापदंड
निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए दिल्ली सरकार ने दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम के तहत नए नियमों को अधिसूचित किया है। इसके जरिए दिल्ली के लगभग 1,700 निजी स्कूलों को सख्त निगरानी के दायरे में लाया गया है।
अधिसूचित नियमों के तहत स्कूलों को अब ‘स्कूल लेवल फीस रेगुलेशन कमेटी’ के समक्ष 18 कड़े मापदंडों और ऑडिटेड वित्तीय रिकॉर्ड्स के आधार पर ही फीस वृद्धि का औचित्य साबित करना होगा। इस प्रक्रिया में अभिभावकों की भागीदारी भी अनिवार्य की गई है। नए प्रावधानों के तहत कोई भी स्कूल केवल महंगाई का सामान्य हवाला देकर या बिना किसी ठोस आधार के अपनी मर्जी से फीस में बढ़ोतरी नहीं कर सकेगा।

