ध्रुव राठी ने मंच से गिनाए SIR के ‘सबूत’, बिहार के 65 लाख वोटर्स का मुद्दा

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देश के कई हिस्सों में विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का विरोध प्रदर्शन जारी है। गुरुवार (8 अक्टूबर, 2026) को जहां पटना में राजभवन मार्च निकाला गया, वहीं बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में यूट्यूबर ध्रुव राठी ने नागरिक संगठनों और कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन को संबोधित किया। अपने संबोधन में राठी ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाए और बिहार, बंगाल व उत्तर प्रदेश के आंकड़े पेश किए।
‘चुनाव आयोग में कोई पारदर्शिता नहीं’
फ्रीडम पार्क में मौजूद भीड़ को संबोधित करते हुए ध्रुव राठी ने कहा कि चुनाव आयोग द्वारा वोटर लिस्ट में नामों को जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव है।
उन्होंने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा, “मैं तीन सबूत दिखाना चाहूंगा, जिसका जवाब ज्ञानेश कुमार, प्रधानमंत्री मोदी या अमित शाह को देना चाहिए। पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले करीब 70 हजार वोटर्स को लिस्ट से हटा दिया गया, लेकिन चुनाव नतीजे आने के बाद उन्हें वापस जोड़ दिया गया। जो लोग घुसपैठियों और मरे हुए वोटर्स का बहाना बना रहे हैं, वे बताएं कि ये लोग दोबारा वोटिंग लिस्ट में कैसे आ गए?”
‘बिहार में 65 लाख लोगों के नाम हटाए गए’
चूंकि चुनाव आयोग ने पिछले साल (2025) बिहार से ही SIR प्रक्रिया की शुरुआत की थी, इसलिए ध्रुव राठी ने प्रमुखता से बिहार का जिक्र किया। अपने दूसरे ‘सबूत’ के तौर पर उन्होंने दावा किया, “बिहार में करीब 65 लाख लोगों के नाम वोटिंग लिस्ट से हटा दिए गए। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने यह बताने की जरूरत ही नहीं समझी कि ये लोग कौन थे।”
उन्होंने आरोप लगाया कि जब तक सुप्रीम कोर्ट ने नामों को सार्वजनिक करने का आदेश नहीं दिया, तब तक चुनाव आयोग ने सब कुछ छिपाकर रखा। राठी ने कहा कि जब तक दबाव नहीं बनाया जाता, तब तक आयोग खुद से कोई जानकारी साझा नहीं करता।
यूपी में 14 लाख नाम जुड़ने का दावा
बिहार और बंगाल के अलावा ध्रुव राठी ने उत्तर प्रदेश और गोवा का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में अचानक करीब 14 लाख नए वोटर्स के नाम लिस्ट में जोड़ दिए गए, लेकिन यह नहीं बताया गया कि ये लोग कौन हैं।
उन्होंने गोवा का उदाहरण देते हुए चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर पर भी सवाल उठाए। राठी के मुताबिक, “गोवा में करीब 100 ऐसे वोटर्स थे जिनके नाम ERO (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर) जोड़ना चाह रहे थे, लेकिन सॉफ्टवेयर में नाम जोड़ने का कोई विकल्प ही मौजूद नहीं था। आयोग अपनी मर्जी से नाम जोड़ रहा है और हटा रहा है, सब कुछ मनमानी से चल रहा है।”

