छिबरामऊ से तिर्वा तक, 22 के BJP दबदबे और 24 की सपा बढ़त की कहानी

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अजमल शाह
अजमल शाह

 भारतीय जनता पार्टी (BJP) और समाजवादी पार्टी (SP) दोनों ही जमीनी स्तर पर समीकरण साधने में जुटी हैं। इस चुनावी जंग में ‘इत्र नगरी’ कन्नौज का मुकाबला बेहद दिलचस्प और प्रतिष्ठा से जुड़ा माना जा रहा है।

कन्नौज पारंपरिक रूप से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ रहा है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जिले की तीनों सीटों पर जीत दर्ज कर सपा को बड़ा झटका दिया था। वहीं, 2024 के लोकसभा चुनाव में समीकरण फिर बदले और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने तीनों विधानसभा क्षेत्रों में भारी बढ़त हासिल की। ऐसे में 2027 में कन्नौज की तीनों सीटों पर मुकाबला बेहद कांटे का होने जा रहा है।

कन्नौज की 3 सीटें: 2022 का जनादेश और 2024 का उलटफेर

कन्नौज जिले में तीन विधानसभा सीटें आती हैं—छिबरामऊ, तिर्वा और कन्नौज सदर (अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित)।

2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन तीनों सीटों पर जीत दर्ज की थी:

  • छिबरामऊ: भाजपा की अर्चना पांडेय ने सपा के अरविंद सिंह यादव को केवल 1,111 वोटों के मामूली अंतर से हराया (अर्चना पांडेय: 1,24,773 वोट | अरविंद यादव: 1,23,662 वोट)।

  • तिर्वा: भाजपा के कैलाश सिंह राजपूत ने सपा के अनिल कुमार पाल को 4,608 मतों से मात दी (कैलाश राजपूत: 1,06,089 वोट | अनिल पाल: 1,01,481 वोट)।

  • कन्नौज सदर (SC): भाजपा के असीम अरुण ने सपा के अनिल कुमार दोहरे को 6,090 वोटों से शिकस्त दी (असीम अरुण: 1,20,876 वोट | अनिल दोहरे: 1,14,786 वोट)।

2024 के लोकसभा चुनाव ने कैसे बदला रुख?

2024 के आम चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव कन्नौज संसदीय सीट से मैदान में उतरे और उन्होंने भाजपा सांसद सुब्रत पाठक को 1,70,922 वोटों के अंतर से हराया (अखिलेश यादव: 6,42,292 वोट | सुब्रत पाठक: 4,71,370 वोट)।

खास बात यह रही कि अखिलेश यादव ने जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर निर्णायक बढ़त दर्ज की:

  • छिबरामऊ: सपा को 51,476 वोटों की भारी बढ़त मिली (अखिलेश यादव: 1,61,107 वोट | सुब्रत पाठक: 1,09,631 वोट)।

  • तिर्वा: सपा को 34,358 वोटों की बढ़त मिली (अखिलेश यादव: 1,27,185 वोट | सुब्रत पाठक: 92,827 वोट)।

  • कन्नौज सदर (SC): सपा ने 34,244 वोटों की बढ़त बनाई (अखिलेश यादव: 1,38,567 वोट | सुब्रत पाठक: 1,04,323 वोट)।

छिबरामऊ: सबसे करीबी मुकाबले वाली सीट पर सबकी नजर

छिबरामऊ सीट 2027 के चुनाव में दोनों दलों की रणनीति के केंद्र में रहेगी। 2022 में महज 1,111 वोटों से हारने के बाद 2024 में सपा ने यहां 51 हजार से ज्यादा वोटों की बढ़त लेकर अपनी ताकत दिखाई।

2027 में भाजपा के सामने चुनौती होगी कि वह 2022 और 2024 के मतदान अंतर की खाई को कैसे पाटे। वहीं सपा की कोशिश 2024 में मिले इस विशाल समर्थन को विधानसभा में स्थायी वोट बैंक में बदलने की होगी। इस सीट पर स्थानीय उम्मीदवारों की छवि और बूथ प्रबंधन सबसे अहम भूमिका निभाएगा।

तिर्वा और कन्नौज सदर (SC): विकास बनाम सामाजिक समीकरण

  • तिर्वा: इस ग्रामीण बहुल इलाके में कृषि, सड़क, क्षेत्रीय विकास और रोजगार प्रमुख मुद्दे हैं। भाजपा यहां अपने मौजूदा विधायक के कामकाज और संगठन की ताकत के सहारे मैदान में उतरेगी, जबकि सपा स्थानीय नाराजगी और 2024 की बढ़त को भुनाने का प्रयास करेगी।

  • कन्नौज सदर (SC): आरक्षित सीट होने के चलते यहां दलित मतों के साथ-साथ अन्य पिछड़ी और अल्पसंख्यक जातियों का समन्वय निर्णायक होगा। भाजपा के पूर्व आईपीएस और कैबिनेट मंत्री असीम अरुण के सामने 2022 की सफलता को दोहराने की संगठनात्मक चुनौती है, जबकि सपा अपने परंपरागत कोर वोटर और पीडीए समीकरण के दम पर वापसी की तैयारी में है।

2027 की महा-रणनीति: BJP के नए चेहरे बनाम SP का ‘PDA’

कन्नौज में दोनों दलों के सामने सबसे बड़ी पहेली लोकसभा और विधानसभा चुनावों के अलग-अलग वोटिंग ट्रेंड को साधना है:

  • भाजपा की तैयारी: पार्टी बूथ स्तर पर संगठन को मजबूत करने, केंद्र व राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को भुनाने और एंटी-इनकंबेंसी से बचने के लिए ‘विनेबिलिटी’ (Winnability) के आधार पर नए चेहरों पर दांव लगाने की रणनीति पर काम कर रही है।

  • सपा का ‘PDA’ फॉर्मूला: अखिलेश यादव का फोकस पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) वर्ग को एकजुट रखने पर है। ‘पीडीए रथ यात्रा’ और हर विधानसभा में वोट शेयर बढ़ाने का अभियान पार्टी का मुख्य आधार है। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ गठबंधन की अंतिम सीट शेयरिंग भी स्थानीय समीकरणों पर असर डालेगी।

लोकसभा और विधानसभा चुनावों के राजनीतिक मुद्दे, स्थानीय चेहरे और मतदाताओं की प्राथमिकताएं अलग होती हैं। इसलिए 2024 की बढ़त 2027 के लिए कोई गारंटी नहीं है। कन्नौज की छिबरामऊ, तिर्वा और सदर—तीनों सीटों पर जीत इस बात से तय होगी कि कौन सा दल टिकट वितरण, बूथ मैनेजमेंट और स्थानीय जनमुद्दों को साधने में अधिक प्रभावी साबित होता है।