बैलेट पेपर की वापसी की मांग: क्या देश फिर से बूथ कैप्चरिंग और हिंसा भोगे?

इंडिया गठबंधन ने आज फिर से मांग की है कि ईवीएम हटाकर बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाएं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने गठबंधन की बैठक में साफ कहा कि बैलेट से वोटिंग हो। यह मांग नई नहीं है। हर चुनाव के बाद हारने वाले पक्ष की तरफ से ईवीएम पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इतिहास याद दिलाता है कि बैलेट पेपर का दौर सिर्फ “पारदर्शिता” का नहीं, बल्कि बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग और खून-खराबे का भी था।बैलेट पेपर युग की सच्चाई: आंकड़े खुद बोलते हैंभारत में बूथ कैप्चरिंग की पहली दर्ज घटना 1957 में बिहार के बेगूसराय जिले के रचियाही गांव में हुई। सशस्त्र गिरोह ने बूथ पर कब्जा कर बैलेट बॉक्स लूट लिए। उसके बाद यह बीमारी पूरे देश में फैल गई।1989 के आम चुनाव में चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार:
- आंध्र प्रदेश: 593 मामले
- उत्तर प्रदेश: 592 मामले
- बिहार: 272 मामले
- कुल 12 राज्यों में 1600 से ज्यादा बूथ कैप्चरिंग की घटनाएं।
बिहार सबसे बदनाम राज्य रहा:
- 1990 से 2004 के बीच चुनावी हिंसा में 641 लोगों की मौत।
- 1996 लोकसभा चुनाव में पूरे देश में 51 मौतों में से 41 अकेले बिहार में।
- 1995 विधानसभा चुनाव में 1,668 बूथों पर री-पोल।
- 2000 विधानसभा में 1,420 बूथों पर री-पोल।
- 1998 लोकसभा चुनाव में देशभर में 4,995 बूथों पर री-पोल का आदेश। बिहार में 1,100 से ज्यादा लोग बूथ कैप्चरिंग और बैलेट फाड़ने के आरोप में गिरफ्तार हुए। दो दर्जन से ज्यादा विधायक और मंत्री तक बूथ कब्जाने की कोशिश में पकड़े गए।
- पटना (1991 और 1998) तथा छपरा (2004) लोकसभा सीटों पर बड़े पैमाने पर धांधली के कारण चुनाव रद्द कर दिए गए।
उत्तर प्रदेश, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु के संवेदनशील क्षेत्रों में बैलेट युग में 10 प्रतिशत तक वोट धांधली के शिकार बताए जाते थे। बंदूकधारी गिरोह बूथ पर कब्जा कर कुछ ही मिनटों में सैकड़ों फर्जी वोट डाल देते थे। महिलाओं और कमजोर वर्गों को घर से बाहर नहीं निकलने दिया जाता था। पत्रकार नलिनी सिंह जैसी रिपोर्टिंग ने 1980-90 के दशक में बिहार में “औद्योगिक स्तर” की बूथ कैप्चरिंग का दस्तावेजीकरण किया था।ईवीएम ने क्या बदला?ईवीएम में एक मिनट में अधिकतम 4-5 वोट ही डाले जा सकते हैं। बूथ कब्जाने के लिए घंटों लगते, जिससे सुरक्षा बल पहुंच जाते। नतीजा: बूथ कैप्चरिंग लगभग खत्म हो गई। चुनाव आयोग और विशेषज्ञों के अनुसार, 2004 के बाद संवेदनशील क्षेत्रों में यह घटनाएं 10 प्रतिशत से घटकर 1 प्रतिशत या उससे भी कम रह गईं। अवैध वोट (invalid votes) भी लगभग समाप्त हो गए, जो पहले कई सीटों पर जीत-हार का फैसला करते थे।दुनिया में ईवीएम कहां चल रही है?इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग पूरी तरह या आंशिक रूप से कई देशों में इस्तेमाल हो रही है। इंटरनेशनल IDEA के आंकड़ों के अनुसार, करीब 34 देश किसी न किसी रूप में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग अपना चुके हैं। इनमें शामिल हैं:
- भारत
- ब्राजील
- नामीबिया
- भूटान
- नेपाल
- वेनेजुएला
- मैक्सिको
- पेरू
- कुछ अमेरिकी राज्य
- बांग्लादेश (पहले इस्तेमाल)
- फ्रांस, रूस, फिजी आदि के कुछ चुनाव
भारत के ईवीएम मॉडल की तारीफ कई देशों ने की है। नामीबिया और भूटान ने भारतीय मशीनें अपनाईं।विपक्ष का दोहरा मापदंडसबसे बड़ा सवाल यही है। जहां विपक्षी दल जीत जाते हैं—चाहे राज्य हो या लोकसभा सीट—वहां ईवीएम पर सवाल नहीं उठते। जीत के बाद “जनता का जनादेश” और हार के बाद “ईवीएम धांधली”। यह पैटर्न बार-बार दोहराया गया है। अगर मशीन वाकई पक्षपाती होती, तो हर जगह एक ही नतीजा क्यों नहीं आता?सवाल आप से है
क्या देश को फिर से 1980-90 के दशक वाली बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग और चुनावी हिंसा का कालखंड भोगना चाहिए? क्या उन सैकड़ों मौतों और हजारों बूथों पर री-पोल की यादें भूलकर हम बैलेट पेपर की “पारदर्शिता” के नाम पर पुरानी अराजकता को आमंत्रित करें?लोकतंत्र में सुधार की मांग जायज है। वीवीपैट का विस्तार, ऑडिट और पारदर्शिता बढ़ाई जा सकती है। लेकिन इतिहास की तरफ मुड़कर पुरानी बीमारियों को वापस लाना समाधान नहीं, बल्कि पीछे की ओर लौटना होगा। चुनाव आयोग और अदालतों ने बार-बार ईवीएम की विश्वसनीयता पर मुहर लगाई है। सवाल अब सिर्फ तकनीक का नहीं, बल्कि राजनीतिक ईमानदारी का भी है।

