‘अस्सलामु अलैकुम’ पर विवाद क्यों? अफसरों के लिए क्या कहते हैं सर्विस रूल्स

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Prabhash Bahadur Civil Services Mentor
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पश्चिम बंगाल कैडर की आईपीएस अधिकारी डॉ. बुशरा बानो का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक बवाल खड़ा हो गया है। एक कोचिंग अकादमी के मंच से संबोधित करते हुए उन्होंने “अस्सलामु अलैकुम”, “इंशाअल्लाह” और “जजाकल्लाह” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। इस वीडियो के सामने आते ही धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक वर्दीधारी सरकारी अधिकारी सार्वजनिक मंच पर अपनी धार्मिक पहचान को इस तरह व्यक्त कर सकता है?

क्या कहता है भारत का कानून और संविधान?

भारत के कानूनी ढांचे में किसी भी व्यक्ति का “अस्सलामु अलैकुम” या कोई अन्य धार्मिक अभिवादन करना अपराध नहीं है:

  • संवैधानिक अधिकार: संविधान का अनुच्छेद 25 देश के हर नागरिक को अंतरात्मा की स्वतंत्रता और धर्म के पालन-प्रचार का मौलिक अधिकार देता है। सरकारी नौकरी में आने से किसी व्यक्ति की धार्मिक अभिव्यक्ति का अधिकार खत्म नहीं होता।

  • अखिल भारतीय सेवा आचरण नियम (1968): IAS और IPS अधिकारियों पर लागू होने वाले ये नियम धर्मनिरपेक्षता और राजनीतिक तटस्थता बनाए रखने पर जोर देते हैं। नियमों के अनुसार, आधिकारिक कामकाज के दौरान किसी भी तरह का धार्मिक पूर्वाग्रह नहीं दिखना चाहिए। हालांकि, केवल व्यक्तिगत अभिवादन को सीधे तौर पर नियम का उल्लंघन नहीं माना जाता।

व्यक्तिगत जिंदगी बनाम आधिकारिक भूमिका

इस पूरे विवाद में निजी जिंदगी और आधिकारिक भूमिका के बीच की बारीक रेखा सबसे अहम है:

  • निजी दायरे में छूट: यदि कोई अधिकारी अपनी निजी बातचीत या गैर-आधिकारिक माहौल में अपनी पसंद का अभिवादन करता है, तो कानून उस पर रोक नहीं लगाता।

  • वर्दी और पद की गरिमा: जब अधिकारी वर्दी में हो, सरकारी मंच पर हो या राज्य के प्रतिनिधि के रूप में बोल रहा हो, तो उससे तटस्थता की उम्मीद की जाती है।

  • ‘जय हिंद’ को प्राथमिकता क्यों? पुलिस और सेना जैसी अनुशासित सेवाएं संस्थागत पहचान पर जोर देती हैं। यही कारण है कि ‘जय हिंद’ जैसे अभिवादनों को प्राथमिकता दी जाती है, क्योंकि वे किसी एक धर्म विशेष से जुड़े हुए नहीं लगते और संस्था की धर्मनिरपेक्ष छवि को बनाए रखते हैं।

अधिकारियों को अपनी धार्मिक पहचान निजी दायरे में रखने की सलाह इसलिए नहीं दी जाती कि आस्था गलत है, बल्कि इसलिए दी जाती है क्योंकि सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति की हर सार्वजनिक अभिव्यक्ति पर समाज की पैनी नजर होती है। वर्दी पहनने के बाद व्यक्ति सिर्फ अपना नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का चेहरा बन जाता है। कानून भले ही ‘अस्सलामु अलैकुम’ या किसी अन्य धार्मिक अभिवादन पर रोक न लगाए, लेकिन आधिकारिक भूमिका में तटस्थता और संस्था का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप बनाए रखना हर अधिकारी के विवेक और जिम्मेदारी का हिस्सा है।