राम मंदिर ट्रस्ट में CEO की एंट्री, महासचिव से कैसे बंटेगी पावर? जानिए

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

अयोध्या : श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपने प्रशासनिक इतिहास में एक बड़ा और अहम बदलाव किया है। भारतीय वायुसेना के रिटायर्ड एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को ट्रस्ट का पहला पूर्णकालिक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) नियुक्त किया गया है। राम मंदिर के निर्माण के बाद अब देश-विदेश से रोजाना आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ और व्यवस्था को पेशेवर तरीके से संभालने के लिए ट्रस्ट ने यह कदम उठाया है। आइए जानते हैं कि इस नए ‘CEO मॉडल’ के आने से मंदिर की कार्यप्रणाली में क्या बदलाव आएगा और महासचिव के मुकाबले नए CEO की ताकत व जिम्मेदारियां क्या होंगी।

क्यों पड़ी CEO पद की जरूरत?

अब राम मंदिर सिर्फ एक धार्मिक निर्माण स्थल नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र बन चुका है जहां प्रतिदिन हजारों और त्योहारों पर लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। आने वाले समय में यह संख्या और बढ़ने वाली है। ऐसे में दैनिक प्रशासन, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन, स्वच्छता, वित्तीय पारदर्शिता और श्रद्धालुओं की सुविधाओं जैसी चीजों को बिना किसी चूक के संभालने के लिए एक पेशेवर और फुल-टाइम प्रशासनिक प्रमुख की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी उद्देश्य से ट्रस्ट के कामकाज को बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNC) की तर्ज पर ढालने की योजना बनाई गई है।

CEO बनाम महासचिव: किसके पास होगी असली ताकत?

ट्रस्ट के मूल संविधान में CEO पद का कोई प्रावधान नहीं था, इसलिए 2 सितंबर 2026 की बैठक में ट्रस्ट डीड में आधिकारिक संशोधन करके इस पद का सृजन किया गया है। शक्तियों के लिहाज से यह साफ किया गया है कि नया CEO केवल ‘कार्यकारी चेहरा’ होगा, जबकि नीतिगत और वित्तीय फैसले लेने की असली ताकत महासचिव के पास ही रहेगी। दोनों के बीच अधिकारों का यह ढांचा तय किया गया है:

  • दैनिक कामकाज की कमान: CEO मंदिर के रोजमर्रा के प्रशासन को संभालेंगे, जिसमें दर्शन प्रबंधन, सुरक्षा समन्वय, वीआईपी मूवमेंट, भीड़ नियंत्रण, स्टाफ की निगरानी और जिला प्रशासन-पुलिस के साथ तालमेल शामिल है।

  • महासचिव के अधीन काम: CEO सीधे महासचिव को रिपोर्ट करेंगे। वह कोई नीतिगत फैसला खुद नहीं लेंगे, बल्कि महासचिव द्वारा तय नीतियों को लागू कराएंगे।

  • वित्तीय और प्रशासनिक नियंत्रण: महासचिव ही CEO की नियुक्ति, उनके कामकाज की समीक्षा और सालाना बजट को मंजूरी देंगे। हर बड़ा वित्तीय फैसला महासचिव के अधीन ही मान्य होगा।

5,585 आवेदनों में से हुआ चयन

इस पद के लिए देश भर से जबरदस्त उत्साह देखने को मिला था और कुल 5,585 आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें कई सेवारत व सेवानिवृत्त आईएएस, आईपीएस, सेना के ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी और विभिन्न संगठनों के दिग्गज शामिल थे।

एक उच्चस्तरीय सर्च कमेटी ने लंबी प्रक्रिया के बाद पूर्व आईएएस योगेश्वर राम मिश्रा, पूर्व आईपीएस राजेश कुमार पांडेय और बिहार के पूर्व डीजीपी परेश सक्सेना समेत तीन नाम शॉर्टलिस्ट किए थे। अंत में, 38 साल के शानदार सैन्य और प्रशासनिक अनुभव वाले एयर मार्शल जितेंद्र मिश्रा को इस प्रतिष्ठित जिम्मेदारी के लिए चुना गया। इसके साथ ही ट्रस्ट ने तीन नए सदस्यों—महेश भागचंदका, मदन मोहन पांडेय और पहली महिला ट्रस्टी के रूप में निर्मला यादव को शामिल कर अपनी प्रशासनिक टीम को और मजबूत किया है।

क्या यह नया मॉडल साबित होगा कारगर?

इस बदलाव से यह तो साफ हो गया है कि ट्रस्ट अब प्रशासनिक मामलों में कोई कोताही नहीं बरतना चाहता। दैनिक क्रियाकलापों का जिम्मा पेशेवर हाथों में सौंपने से महासचिव और वरिष्ठ पदाधिकारियों को बड़े रणनीतिक फैसले लेने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा। हालांकि, आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नए CEO और महासचिव के बीच काम का यह तालमेल प्रशासनिक दक्षता को कितना और बेहतर बनाता है।