West Bengal से Paschim Banga तक, नाम बदलने की तैयारी में सरकार

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अजमल शाह
अजमल शाह

पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की दशकों पुरानी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य ने सोमवार को ऐलान किया कि राज्य सरकार जल्द ही विधानसभा में राज्य का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ (Paschim Banga) करने के लिए एक बिल पेश करने जा रही है।

वाराणसी में ‘पश्चिम बंग भवन’ बनाने के प्रस्ताव से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए भट्टाचार्य ने यह जानकारी साझा की। राज्य को नया नाम दिए जाने के पीछे का कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यह फैसला राज्य को उसके इतिहास से जोड़ने के लिए लिया गया है।

‘अब वेस्ट बंगाल या बांग्ला कहने की जरूरत नहीं’

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान भट्टाचार्य ने स्पष्ट किया कि नाम बदलने की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। उन्होंने कहा, “अब आपको ‘बांग्ला’ या ‘वेस्ट बंगाल’ जैसे नाम लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि राज्य सरकार बहुत जल्द या विधानसभा के इसी सत्र में हमारे राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ करने के लिए एक बिल पेश करेगी, जो इसके इतिहास के अनुरूप होगा।”

वर्णमाला क्रम और ममता सरकार का पुराना तर्क

पश्चिम बंगाल का नाम बदलने का मुद्दा 2011 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सत्ता में आने के बाद प्रमुखता से उठा था। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने शुरू में ‘पश्चिम बंग’ का ही प्रस्ताव रखा था।

सरकार का मुख्य तर्क प्रशासनिक दिक्कतों से जुड़ा था। राज्यों की वर्णमाला सूची (Alphabetical Order) में ‘W’ (West Bengal) नीचे होने के कारण राष्ट्रीय बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को बोलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था। 2011 में एक सर्वदलीय बैठक ने इस नामकरण का समर्थन भी किया था, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे अपनी मंजूरी नहीं दी।

‘बांग्ला’ नाम पर क्यों फंसा था पेंच?

2011 के झटके के बाद, राज्य सरकार ने 2016 में इस प्रक्रिया को फिर से शुरू किया। इस बार तीन भाषाओं के हिसाब से अलग-अलग नाम प्रस्तावित किए गए—बंगाली में ‘बांग्ला’, अंग्रेजी में ‘बंगाल’ और हिंदी में ‘बंगाल’। इसके बाद 2018 में बंगाल विधानसभा ने सर्वसम्मति से केवल ‘बांग्ला’ को राज्य का एकमात्र नाम बनाने का प्रस्ताव पारित किया।

केंद्र सरकार ने इस प्रस्ताव को भी मंजूर नहीं किया। इसके पीछे संवैधानिक संशोधन की जरूरत का हवाला दिया गया। साथ ही, राज्य में बीजेपी नेताओं के एक वर्ग ने भी ‘बांग्ला’ नाम को लेकर चिंता जताई थी, क्योंकि यह पड़ोसी देश ‘बांग्लादेश’ के नाम से काफी समानता रखता था।

ज्योति बसु के समय से चल रही है नाम बदलने की कवायद

राज्य का नाम बदलने का यह प्रयास नया नहीं है। इसकी जड़ें 1999 से जुड़ी हैं, जब तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नया नाम ‘पश्चिम बंग’ रखने का प्रस्ताव पेश किया था। उस समय भी इस बात पर लंबी बहस हुई थी कि राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ होना चाहिए या ‘बांग्ला’।

वाम मोर्चा सरकार का मुख्य उद्देश्य राज्य के नाम से औपनिवेशिक दौर (Colonial era) की छाप को हटाकर उसे विशुद्ध बंगाली पहचान देना था। वाम सरकार ने ‘पश्चिम बंग’ नाम पर सहमति बनाकर प्रस्ताव केंद्र को भेजा था, लेकिन राजनीतिक सहमति की कमी और केंद्र की मंजूरी न मिलने के कारण यह प्रक्रिया वहीं अटक गई थी।