यूपी 2027: कांग्रेस की ‘बराबरी’ की चाह और अखिलेश का ‘जीत’ वाला फॉर्मूला

उत्तर प्रदेश की सियासत में एक पुरानी कहावत है—गठबंधन आसान है, सीट बंटवारा मुश्किल। 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच यही खेल फिर शुरू हो गया है। लेकिन इस बार कांग्रेस की चाल पहले से ज्यादा आक्रामक दिख रही है।
प्रियंका गांधी वाड्रा की अगुवाई में कांग्रेस ने यूपी के पदाधिकारियों के साथ बैठकें कीं और अब सपा को करीब 170-172 सीटों की सूची सौंप दी है। सूची को चार कैटेगरी में बांटा गया है। ‘ए’ कैटेगरी की सीटों पर पार्टी लगभग अडिग है, जबकि बाकी पर बातचीत की गुंजाइश छोड़ रखी है। पहले 150 सीटों की चर्चा थी, अब कुछ नेता 200 तक का आंकड़ा भी दोहरा रहे हैं। 403 सीटों वाले राज्य में यह लगभग आधा हिस्सा मांगने जैसा है।
कांग्रेस का तर्क
पार्टी का कहना है कि 2024 लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की सफलता में उसका भी योगदान था। छह लोकसभा सीटें जीतने के बाद कांग्रेस खुद को ‘सम्मानजनक हिस्सेदारी’ का हकदार मान रही है। इमरान मसूद जैसे नेता साफ कहते हैं कि पार्टी अब 2017 वाली कमजोर कांग्रेस नहीं रही। वे चाहते हैं कि सीटें जल्द फाइनल हों और दोनों पक्ष एक-दूसरे का सम्मान करें।
कांग्रेस के पास एक बैकअप प्लान भी है। अगर बात नहीं बनी तो पार्टी अकेले सभी 403 सीटों पर उतरने की तैयारी में जुटी हुई है।
सपा का रुख
अखिलेश यादव का फॉर्मूला साफ है—“सीट जरूरी नहीं, जीत जरूरी है।” सपा के कई नेता मानते हैं कि 2022 में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं, जबकि सपा 111 पर पहुंची थी। ऐसे में 50-55 सीटों से ज्यादा देना उनके हिसाब से ‘सीटें बर्बाद’ करने जैसा होगा। सपा खुद करीब 350 सीटों पर अपनी तैयारी कर रही है।
पार्टी प्रवक्ता फखरुल हसन चांद जैसे नेता गठबंधन को पक्का बता रहे हैं, लेकिन संख्या पर कोई सख्त वादा नहीं कर रहे। उनका जोर है कि दोनों दल बैठकर फैसला लेंगे और लक्ष्य भाजपा को हराना है।
असली परीक्षा
यह सिर्फ सीटों का आंकड़ा नहीं। यह दोनों पार्टियों की शक्ति का आकलन है। कांग्रेस चाहती है कि उसे गठबंधन में बराबरी का दर्जा मिले। सपा चाहती है कि गठबंधन उसकी शर्तों पर चले और ‘विनेबिलिटी’ ही आधार बने।
2024 में दोनों ने मिलकर अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन विधानसभा चुनाव अलग खेल है। यहां संगठन, जाति समीकरण और जमीनी ताकत मायने रखती है। अगर कांग्रेस बहुत ज्यादा सीटें मांगती रही और सपा बहुत कम देने पर अड़ी रही, तो गठबंधन की गाड़ी बीच रास्ते में अटक सकती है।
अभी दोनों तरफ से नरम बयान आ रहे हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच सीधी बातचीत जारी है। लेकिन सियासी गलियारों में एक बात साफ है—2027 का गठबंधन तभी मजबूत होगा जब दोनों पक्ष ‘जीत’ के फॉर्मूले पर सहमत होकर संख्या का समझौता कर लें।
अभी तो सिर्फ लिस्टें शेयर हुई हैं। असली सौदाबाजी बाकी है।

