2027 का चुनाव: जब BJP बच्चों को ‘जंगलराज’ की कहानी सुनाएगी

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ASHISH SHARMA RISHI
ASHISH SHARMA RISHI

उत्तर प्रदेश में 2027 का विधानसभा चुनाव सिर्फ जातीय समीकरण, गठबंधन या उम्मीदवारों की लड़ाई नहीं होगा। यह याददाश्त की लड़ाई होगी। बल्कि कहिए तो ‘याद दिलाने’ की लड़ाई।

माजरा यह है कि 2027 में 18 से 22 साल के लाखों युवा वोट डालेंगे। इनमें से ज्यादातर अखिलेश यादव की 2012-17 वाली सरकार के समय या तो माँ की गोद में थे, या फिर क्लास 1-2 में ‘ए बी सी’ रट रहे थे। यानी BJP पिछले कई चुनावों में जिस ‘जंगलराज’ वाले नैरेटिव को SP पर फेंकती रही है, नई पीढ़ी के लिए वह नैरेटिव उतना ही पुराना है जितना उनके लिए नोकिया 3310।

अब BJP युवा मोर्चा ‘सार्थक युवा संवाद’ नाम का अभियान शुरू करने जा रही है। नाम ही इतना सार्थक है कि सुनते ही युवा कह उठे—‘भई, संवाद तो ठीक है, लेकिन नौकरी कब दोगे?’ इस अभियान में सांसद, विधायक और MLC कॉलेजों-यूनिवर्सिटीज में जाकर युवाओं को समझाएंगे कि 2012-17 में कितना अंधेरा था और 2017 के बाद कितना उजाला हो गया। लगभग ऐसे जैसे कोई दादाजी पोते को सुना रहे हों—‘बेटा, हमारे जमाने में तो शेर घूमते थे सड़कों पर…’

उम्र का गणित और भी मजेदार है। 2027 का 18 साल का वोटर 2012 में महज 3-4 साल का था। यानी जब अखिलेश सरकार चल रही थी, तब वह शायद ‘छोटा भीम’ देख रहा था, न कि डायल-100 या एक्सप्रेसवे। 22 साल के वोटर की हालत भी इससे बहुत अलग नहीं। यानी BJP को एक पूरी पीढ़ी को इतिहास का पाठ पढ़ाना है—वह भी उस इतिहास का, जिसे उन्होंने खुद जिया ही नहीं।

पार्टी का प्लान साफ है। NCRB के आंकड़े, अपराध की कहानियां, कानून-व्यवस्था के किस्से… सब युवाओं के सामने परोसे जाएंगे। लेकिन मजे की बात यह है कि BJP सिर्फ पुरानी सरकार की बुराई नहीं करेगी। वह युवाओं से उनकी मौजूदा समस्याएं भी पूछेगी। यानी एक तरफ ‘पहले कितना बुरा था’ की कहानी, दूसरी तरफ ‘अभी क्या चाहिए’ का फीडबैक। लगभग ऐसे जैसे कोई डॉक्टर मरीज से पूछे—‘पहले बुखार था न? अब बताओ सिर तो नहीं दर्द कर रहा?’

यहां असली व्यंग्य छिपा है। ये युवा वोटर 2017 के बाद की दुनिया में बड़े हुए हैं। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाएं, बेरोजगारी, महंगाई—ये सब उनके अपने अनुभव हैं। वे ‘जंगलराज’ की कहानी सुन तो सकते हैं, लेकिन अपनी जेब और अपने भविष्य का हिसाब पहले करेंगे। 2024 के लोकसभा नतीजों ने BJP को पहले ही इशारा दे दिया था कि युवा आसानी से रिझने वाले नहीं।

अखिलेश यादव के लिए भी यह मौका कम चुनौतीभरा नहीं। उन्हें भी अपनी 2012-17 वाली सरकार को उन युवाओं के सामने ‘विकास की सुनहरी याद’ बनाकर पेश करना होगा, जिन्होंने वह सुनहरी याद कभी देखी ही नहीं। यानी दोनों पार्टियां एक ही पांच साल को दो अलग-अलग परियों की कहानी बनाकर सुनाएंगी। एक कहेगी—‘जंगल था’, दूसरी कहेगी—‘बगीचा था’। और बीच में बैठा युवा सोचता रहेगा—‘भई, मुझे तो अभी की नौकरी चाहिए।’

अंत में असली सवाल यही है। 2027 में लड़ाई 2012 की याद की होगी या 2027 की जरूरत की? BJP पुरानी कहानी नई पीढ़ी को सुनाएगी, SP अपनी कहानी दोहराएगी। लेकिन फैसला वह युवा करेगा, जिसकी याददाश्त में न तो जंगलराज है और न ही लैपटॉप योजना। उसकी याददाश्त में सिर्फ अपना वर्तमान है। और वर्तमान, जैसा कि हम सब जानते हैं, कभी भी पुरानी कहानियों से खुश नहीं होता।