सपा-कांग्रेस के बीच बंटवारे में ‘हारी हुई सीटों’ का मुद्दा क्यों बना नया सिरदर्द

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले ‘इंडिया’ गठबंधन के दो प्रमुख घटक दलों—समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस (Congress) के बीच सीट बंटवारे (Seat Sharing) को लेकर अंदरूनी खींचतान जारी है। कांग्रेस जहां पिछले लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर ज्यादा और जिताऊ सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रही है, वहीं सपा उसे 2017 के उस कड़वे अनुभव की याद दिला रही है जब कांग्रेस को 100 सीटें दी गई थीं और वह महज 7 सीटों पर सिमट गई थी।

हालांकि, इस बार सीट शेयरिंग में सबसे बड़ा सिरदर्द सिर्फ ‘जिताऊ’ सीटें नहीं, बल्कि वे सीटें बन गई हैं जहां दोनों ही दल अपनी जीत को असंभव मान रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में सवाल यह है कि भाजपा के इन अभेद्य किलों और स्थानीय क्षत्रपों के गढ़ में आखिर ‘बलि का बकरा’ कौन बनेगा?

वे 9 सीटें जिन्हें कोई भी अपने खाते में नहीं लेना चाहता

सीट बंटवारे की बातचीत में साहिबाबाद, गाजियाबाद, नोएडा, मेरठ कैंट, वाराणसी कैंट, जेवर, गोरखपुर सदर, अयोध्या और कुंडा जैसी सीटें दोनों ही दलों के लिए सबसे बड़ी फांस बनी हुई हैं। इन सीटों का सियासी इतिहास बताता है कि यहां सपा या कांग्रेस का जीतना लगभग नामुमकिन रहा है:

1. मेरठ कैंट: 1989 से लगातार भाजपा का कब्जा मेरठ कैंट विधानसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी 1989 से लगातार चुनाव जीतती आ रही है। यहां बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तो कभी-कभार मुख्य मुकाबले में दिखाई दी, लेकिन सपा और कांग्रेस संगठन के स्तर पर यहां हमेशा बेहद कमजोर साबित हुए हैं।

2. साहिबाबाद और गाजियाबाद: रिकॉर्ड मार्जिन वाला भाजपा गढ़ 2012 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई साहिबाबाद सीट पर पहली बार बसपा के अमरपाल शर्मा जीते थे। लेकिन 2017 और 2022 में भाजपा के सुनील कुमार शर्मा (वर्तमान में योगी सरकार में मंत्री) ने यहां रिकॉर्ड मतों के अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की। ऐसे में इस सीट पर सपा या कांग्रेस में से कोई भी अपना प्रत्याशी उतारकर हार का ठीकरा अपने सिर नहीं फोड़ना चाहता।

3. नोएडा और जेवर: तीन दशकों से गठबंधन का सूखा

  • नोएडा: 2012 में सीट बनने के बाद से यह भाजपा का अभेद्य दुर्ग है। पहले डॉ. महेश शर्मा, फिर उपचुनाव में बिमला बाथम और 2017 व 2022 में लगातार पंकज सिंह ने यहां बड़े अंतर से जीत दर्ज की है।

  • जेवर: यहां 1991, 1993 और 1996 में भाजपा जीती, जिसके बाद 2002 से लगातार तीन बार बसपा का कब्जा रहा। 2017 और 2022 में फिर भाजपा ने कब्जा जमाया। पिछले तीन दशकों से सपा या कांग्रेस यहां खाता तक नहीं खोल पाई हैं।

4. गोरखपुर सदर: सीएम योगी का गृह क्षेत्र मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद की गोरखपुर सदर सीट पर 1989 से लगातार भाजपा का परचम लहरा रहा है। वर्तमान में खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ यहां से विधायक हैं और जीत का अंतर इतना भारी रहता है कि विपक्ष के लिए जमानत बचाना भी चुनौती बन जाता है।

5. वाराणसी कैंट: 1991 से भगवा परचम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र की वाराणसी कैंट विधानसभा सीट पर 1991 से लगातार भाजपा ही जीतती आई है। यहां का जातीय और शहरी समीकरण पूरी तरह भाजपा के अनुकूल रहा है, जहां सपा-कांग्रेस गठबंधन खुद को असहाय पाता है।

6. कुंडा: तीन दशक से ‘राजा भैया’ का एकछत्र राज प्रतापगढ़ की कुंडा सीट सपा और कांग्रेस दोनों के लिए सबसे अबूझ पहेली है। यहां से रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ‘राजा भैया’ 1993 से लगातार निर्दलीय या अपनी पार्टी (जनसत्ता दल लोकतांत्रिक) से अजेय रहे हैं। इस सीट पर राजा भैया के खिलाफ लड़ने का जोखिम कोई दल नहीं उठाना चाहता।

स्ट्राइक रेट गिरने का डर

सपा और कांग्रेस के रणनीतिकारों को अच्छी तरह मालूम है कि अगर वे इन सीटों को अपने कोटे में शामिल करते हैं, तो चुनाव के बाद उनके ‘स्ट्राइक रेट’ पर सीधा असर पड़ेगा।

कांग्रेस चाहती है कि सपा अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में इन कठिन सीटों को संभाले, जबकि सपा का तर्क है कि शहरी मिजाज वाली इन सीटों पर कांग्रेस को लड़ना चाहिए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि दोनों दल इन ‘कठिन सीटों’ का बंटवारा किस फॉर्मूले के तहत करते हैं।