2022 में SP ने जीती थीं 4 सीटें, अब बस्ती में BJP के सामने वापसी की चुनौती

अवध और पूर्वांचल के संगम तट पर बसा बस्ती जिला उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘सत्ता की चाबी’ तय करने वाले अहम गढ़ों में गिना जाता है। महर्षि वशिष्ठ की तपोभूमि और 1857 की क्रांति के साक्षी अमोढ़ा खास की यह ऐतिहासिक धरती चुनावी राजनीति में भी हवा का रुख तय करती रही है। 2022 के विधानसभा चुनाव में बस्ती जिले की 5 सीटों में से 4 पर समाजवादी पार्टी गठबंधन ने परचम लहराया था, जबकि भारतीय जनता पार्टी (BJP) केवल हर्रैया की एकमात्र सीट ही बचा सकी थी।
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे राजनीतिक दलों के लिए बस्ती का मैदान सामाजिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से साख की लड़ाई बन चुका है।
2022 का चुनावी परिणाम: सपा गठबंधन का दबदबा
2022 के विधानसभा चुनाव में बस्ती की पांचों सीटों पर कड़ा और दिलचस्प मुकाबला देखा गया था। समाजवादी पार्टी ने कप्तानगंज, रुधौली और बस्ती सदर में जीत दर्ज की, जबकि महादेवा (सुरक्षित) सीट पर सपा के तत्कालीन सहयोगी दल सुभासपा के उम्मीदवार ने बाजी मारी थी।
| विधानसभा सीट | विजेता प्रत्याशी | पार्टी | मिले वोट | निकटतम प्रतिद्वंद्वी | पार्टी | मिले वोट | जीत का अंतर |
| हर्रैया (307) | अजय सिंह | BJP | 88,200 | त्रयंबक नाथ (तुलसीदास) | SP | 69,871 | 18,329 |
| कप्तानगंज (308) | काविंद्र चौधरी | SP | 94,273 | चंद्र प्रकाश शुक्ला | BJP | 70,094 | 24,179 |
| रुधौली (309) | राजेंद्र प्रसाद चौधरी | SP | 86,360 | संगीता देवी | BJP | 71,134 | 15,226 |
| बस्ती सदर (310) | महेंद्र नाथ यादव | SP | 86,029 | दयाराम चौधरी | BJP | 84,250 | 1,779 |
| महादेवा – SC (311) | दूधराम | SBSP | 83,350 | रवि कुमार सोनकर | BJP | 77,855 | 5,495 |
(नोट: हर्रैया सीट पर बसपा के राज किशोर सिंह ने 55,697 वोट, कप्तानगंज में बसपा के जहीर अहमद ने 40,381 वोट, रुधौली में बसपा के अशोक कुमार मिश्र ने 37,618 वोट, बस्ती सदर में बसपा के आलोक रंजन वर्मा ने 36,429 वोट और महादेवा में बसपा के लक्ष्मी चंद्र खरवार ने 40,207 वोट हासिल किए थे।)
सीटों का जमीनी मिजाज: सदर में कांटे की टक्कर, हर्रैया में बचा भाजपा का किला
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बस्ती सदर (310): जिले की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट पर 2022 में बेहद नजदीकी मुकाबला हुआ था। सपा के महेंद्र नाथ यादव ने भाजपा के पूर्व विधायक दयाराम चौधरी को केवल 1,779 वोटों के बेहद कम अंतर से हराया था। 2027 में यह सीट दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बनेगी।
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हर्रैया (307): यह जिले की इकलौती सीट रही जहां भाजपा अपना कब्जा बरकरार रख सकी। भाजपा के अजय सिंह ने सपा के त्रयंबक नाथ को 18 हजार से अधिक वोटों से मात दी थी। बसपा के राज किशोर सिंह के 55 हजार से ज्यादा वोट पाने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था।
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कप्तानगंज (308): सपा के काविंद्र चौधरी ने भाजपा के मौजूदा विधायक चंद्र प्रकाश शुक्ला को 24,179 वोटों के भारी अंतर से हराकर सीट छीन ली थी।
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रुधौली (309): सपा के राजेंद्र प्रसाद चौधरी ने भाजपा की संगीता देवी को 15,226 वोटों से शिकस्त दी थी।
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महादेवा सुरक्षित (311): इस आरक्षित सीट पर सुभासपा के दूधराम ने कड़े संघर्ष में भाजपा के रवि कुमार सोनकर को 5,495 वोटों से हराया था। बसपा प्रत्याशी ने 40 हजार से अधिक वोट पाकर मुकाबले को कड़ा बनाया था।
बस्ती जिले की जनसांख्यिकी और सामाजिक ताना-बाना
2011 की जनगणना के अनुसार बस्ती जिले की कुल आबादी 24,64,464 है, जिसमें पुरुष आबादी 12,55,272 और महिला आबादी 12,09,192 है। जिले की औसत साक्षरता दर 67.22 प्रतिशत है (पुरुष साक्षरता 77.88% और महिला साक्षरता 56.23%)।
धार्मिक आधार पर आबादी का विभाजन:
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हिंदू: 20,82,976
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मुस्लिम: 3,64,510
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बौद्ध: 9,850
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ईसाई: 3,493
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सिख: 900
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जैन: 71
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अन्य: 86
चुनावी राजनीति में यहां ब्राह्मण, कुर्मी, मौर्य, दलित और मुस्लिम मतदाताओं का गठजोड़ हार-जीत की दिशा तय करता है। बहुजन समाज पार्टी का हर सीट पर 35 से 55 हजार के बीच वोट बैंक पाना यह साबित करता है कि त्रिकोणीय समीकरण बनते ही नतीजे किसी भी दिशा में मुड़ सकते हैं।
चुनावी विमर्श के मुख्य मुद्दे
बस्ती की राजनीति में स्थानीय कृषि और बुनियादी ढांचे से जुड़े सवाल हमेशा हावी रहते हैं:
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चीनी मिल और गन्ना भुगतान: वाल्टरगंज की बंद पड़ी चीनी मिल को फिर से शुरू करने की मांग और गन्ना किसानों के बकाए का समय पर भुगतान हर चुनाव में सबसे संवेदनशील मुद्दा रहता है।
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बाढ़ और कटान: कुआनों और मनोरमा नदियों के तटवर्ती इलाकों में हर साल होने वाले कटान और बाढ़ से किसानों की फसल का नुकसान बड़ा मुद्दा बनता है।
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पर्यटन और विरासत: महर्षि वशिष्ठ आश्रम और राजा दशरथ की पुत्रेष्टि यज्ञ स्थली मखौड़ा धाम के समग्र पर्यटन विकास की मांग लंबे समय से उठ रही है।
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शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार: स्थानीय स्तर पर औद्योगिक इकाइयों की कमी के कारण युवाओं का पलायन और ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे में सुधार की मांग मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करती है।

