यूपी विधानसभा के ‘प्रमुख सचिव’ की यात्रा पर पेंच, क्लीयरेंस रद्द करने की मांग

pradeep dubey
गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की आगामी विदेश यात्रा को लेकर बड़ा कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन. सिंह ने विदेश मंत्रालय (MEA) के सचिव को एक तत्काल प्रतिवेदन (Urgent Representation) भेजकर उनका विदेशी यात्रा क्लीयरेंस रोकने या रद्द करने की मांग की है। यह मांग इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके पद को लेकर चल रही कानूनी कार्यवाही और यूपी विधानसभा सचिवालय की ओर से ही अदालत में दिए गए एक हलफनामे के आधार पर की गई है।

पद पर सवाल, तो आधिकारिक विदेश यात्रा कैसे?

प्रदीप कुमार दुबे सितंबर-अक्टूबर 2026 में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संसदीय सम्मेलन (IPU/CPA) में हिस्सा लेने वाले हैं। अधिवक्ता के पत्र में इस दौरे पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा गया है कि दुबे की स्थिति, अधिकार और पद पर बने रहने का मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में विचाराधीन है।

शिकायत में उस हलफनामे का विशेष जिक्र किया गया है, जिसे यूपी विधानसभा के संयुक्त सचिव उमेश चंद्र पांडेय ने 27 जुलाई 2026 को हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में दाखिल किया था। इस हलफनामे में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि प्रदीप कुमार दुबे किसी सार्वजनिक पद पर नहीं हैं और उन्हें एक ‘निजी व्यक्ति’ माना जा रहा है। पत्र में सवाल उठाया गया है कि जब राज्य विधानसभा खुद अदालत में उन्हें सार्वजनिक पद पर न होने की बात कह चुकी है, तो वे आधिकारिक प्रतिनिधि के तौर पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में विदेश यात्रा कैसे कर सकते हैं।

2012 के आदेश और न्यायिक मर्यादा का हवाला

विदेश मंत्रालय को भेजे गए पत्र में 29 फरवरी 2012 के एक पुराने अदालती आदेश का भी जिक्र है, जिसके जरिए उनके कामकाज पर रोक (Stay) लगाई गई थी। अधिवक्ता ने तर्क दिया है कि हाईकोर्ट के लंबित मामलों और 5 जून 2026 के हालिया आदेशों को देखते हुए, अदालत की पूर्व अनुमति के बिना उन्हें विदेश यात्रा की मंजूरी देना संस्थागत और न्यायिक मर्यादा के खिलाफ हो सकता है।

विदेश मंत्रालय से स्वतंत्र जांच की मांग

शिकायतकर्ता ने विदेश मंत्रालय से आग्रह किया है कि वह केवल विभागीय सिफारिश या अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के आधार पर फैसला न ले। मंत्रालय को स्वतंत्र रूप से यह जांच करनी चाहिए कि यह प्रस्तावित यात्रा किस कानूनी अधिकार के तहत हो रही है। पत्र में मांग की गई है कि जब तक उनकी कानूनी स्थिति सत्यापित नहीं हो जाती, तब तक उनके पक्ष में जारी किसी भी यात्रा क्लीयरेंस या NOC को स्थगित रखा जाए या वापस ले लिया जाए।

यात्रा के खर्च और नॉमिनेशन पर भी उठे सवाल

अधिवक्ता ने अपने पत्र में यह भी पता लगाने को कहा है कि दुबे को इस अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के लिए किसने नामित किया है, वे किस कानूनी हैसियत से यात्रा कर रहे हैं और इस यात्रा का खर्च कौन उठा रहा है।

पत्र में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 का हवाला देते हुए इस प्रस्तावित विदेश यात्रा के संपूर्ण रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां भी मांगी गई हैं। इनमें आवेदन, नॉमिनेशन, सिफारिश, NOC, विदेश यात्रा क्लीयरेंस और उन अप्रूवल्स की कॉपी शामिल है, जिनके अधिकार क्षेत्र में इस यात्रा को मंजूरी दी गई है। शिकायत में विदेश मंत्रालय से अपील की गई है कि मामला विचाराधीन होने के कारण कोई भी ऐसा प्रशासनिक कदम न उठाया जाए, जो हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र या आदेशों का उल्लंघन करता हो।