SC का UP सरकार से सवाल, पुलिस कस्टडी के कबूलनामे पर NSA क्यों?

संभल हिंसा मामले में कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाए जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कड़े सवाल किए हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे की कानूनी वैधता पर सवाल उठाते हुए सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।
सुप्रीम कोर्ट के अहम सवाल
-
शीर्ष अदालत ने यूपी सरकार से पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए किसी कथित कबूलनामे को निवारक हिरासत (Preventive Detention) का सीधा आधार बनाया जा सकता है।
-
कोर्ट ने जानना चाहा कि क्या ऐसा बयान अधिकारियों की उस ‘विषयगत संतुष्टि’ (Subjective Satisfaction) का ठोस आधार बन सकता है, जिसके तहत NSA की गंभीर कार्रवाई की जाती है।
गिरफ्तारी और NSA का घटनाक्रम
नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। मुल्ला अफरोज की गिरफ्तारी और उस पर कानूनी कार्रवाई का क्रम इस प्रकार रहा:
-
हिंसा के 54 दिन बाद पुलिस ने कथित कबूलनामे के आधार पर उसे गिरफ्तार किया।
-
बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट से आरोपी को इस मामले में जमानत मिल गई।
-
जमानत मिलने के बाद 13 अक्टूबर 2025 को प्रशासन ने उसके खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी कर दिया।
-
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने NSA के आदेश को बरकरार रखा, जिसके खिलाफ उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
याचिकाकर्ता की प्रमुख दलीलें
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से निवारक हिरासत को पूरी तरह गैरकानूनी बताया गया:
-
केवल कई आपराधिक मामले दर्ज होना या भविष्य में अपराध की आशंका होना NSA जैसी कार्रवाई का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
-
पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि किसी की स्वतंत्रता को सीमित करने के लिए संभावनाओं के बजाय ठोस साक्ष्यों की आवश्यकता होती है।
-
याचिका में पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि हिंसा के दौरान पुलिस ने खुद गोलीबारी की थी, जिसकी निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई। बचाव पक्ष ने इस संबंध में प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल करने की अनुमति भी मांगी है।
