अफगानिस्तान में 2200 साल से कृष्ण-बलराम का नाम, सिक्कों से खुला राज

india
Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

2200 साल पहले, जब आधुनिक संचार और परिवहन के साधन नहीं थे, तब भी अफगानिस्तान (प्राचीन बैक्ट्रिया) में भारतीय धार्मिक परंपराओं की गहरी छाप थी। पुरातत्वविदों को इस इलाके से कुछ ऐसे प्राचीन सिक्के मिले हैं, जिन पर भगवान बलराम और वासुदेव कृष्ण की आकृतियां उकेरी गई हैं। सबसे खास बात यह है कि इन सिक्कों को किसी भारतीय राजा ने नहीं, बल्कि इंडो-ग्रीक (यूनानी) शासक अगाथोक्लीज ने जारी किया था। यह खोज केवल एक सिक्के की नहीं, बल्कि भारत और यूनानी दुनिया के बीच संस्कृति, व्यापार और धार्मिक विचारों के मजबूत संवाद की गवाही देती है।

सिक्कों पर हल, मूसल और वासुदेव का चक्र

दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बैक्ट्रिया (आज का अफगानिस्तान और आसपास का इलाका) मध्य एशिया का एक प्रमुख राजनीतिक और व्यापारिक केंद्र था। यह क्षेत्र भारत, ईरान और यूनानी दुनिया के बीच संपर्क का अहम पड़ाव था। इसी इलाके में मिले अगाथोक्लीज के सिक्कों पर एक तरफ एक पुरुष आकृति है, जिसके हाथ में हल और मूसल है—जो बलराम की स्पष्ट पहचान हैं। वहीं दूसरी ओर चक्र के साथ वासुदेव कृष्ण की आकृति दिखाई देती है। मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट (Met) भी इन सिक्कों को बलराम की सबसे शुरुआती ज्ञात दृश्य अभिव्यक्तियों में से एक मानता है। एक ही सिक्के पर यूनानी राजनीतिक परंपरा और भारतीय धार्मिक प्रतीकों का यह मेल इसे उस दौर का एक ‘सांस्कृतिक पासपोर्ट’ बनाता है।

क्या यूनानी शासक अगाथोक्लीज कृष्ण भक्त थे?

इतिहासकारों के लिए यह कहना मुश्किल है कि अगाथोक्लीज पूरी तरह से कृष्ण के भक्त थे या नहीं। सिक्कों पर इन देवताओं की मौजूदगी के पीछे उनकी धार्मिक आस्था हो सकती है, या फिर यह स्थानीय भारतीय आबादी को साधने की एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति हो सकती है। वजह चाहे जो हो, लेकिन एक बात साफ है कि उस दौर में भारतीय धार्मिक प्रतीक अपनी भौगोलिक सीमाओं को पार कर इंडो-ग्रीक राजनीतिक संसार का हिस्सा बन चुके थे।

चिलास के शैलचित्र और विदिशा का हेलियोडोरस स्तंभ

कृष्ण-बलराम से जुड़े प्रमाण सिर्फ इन सिक्कों तक सीमित नहीं हैं। उत्तर-पश्चिम भारतीय उपमहाद्वीप के चिलास क्षेत्र में मिले पहली शताब्दी ईस्वी के प्राचीन शैलचित्रों (petroglyphs) को भी बलराम की शुरुआती छवियों में गिना जाता है। इसके अलावा, भारत के मध्य प्रदेश के विदिशा में स्थित दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व का ‘हेलियोडोरस स्तंभ’ इसका एक और मजबूत प्रमाण है। इंडो-ग्रीक शासक एंटियल्किडास द्वारा शुंग शासक भागभद्र के दरबार में भेजे गए यूनानी राजदूत हेलियोडोरस ने भारत आकर वासुदेव की उपासना अपना ली थी। शिलालेख में वह खुद को गर्व से ‘भागवत’ बताता है।

मेगस्थनीज का विवरण और विचारों की यात्रा

मौर्यकाल में भारत आए यूनानी राजदूत मेगस्थनीज के लेखों में भी शूरसेन और वहां पूजे जाने वाले एक शक्तिशाली देवता का जिक्र मिलता है, जिसे विद्वान कृष्ण/वासुदेव परंपरा से जोड़ते हैं। ये सभी ऐतिहासिक कड़ियां बताती हैं कि प्राचीन भारत का प्रभाव केवल युद्धों और साम्राज्यों की सीमाओं से नहीं मापा जा सकता।

प्राचीन भारत की असली ताकत यह थी कि उसके विचार, भाषाएं और देवता व्यापार मार्गों के जरिए लंबी यात्राएं कर रहे थे और दुनिया की दूसरी सभ्यताओं के साथ गहरे स्तर पर संवाद कर रहे थे। आज बैक्ट्रिया के राजवंश और साम्राज्य मिट चुके हैं, लेकिन अगाथोक्लीज के 2200 साल पुराने छोटे-से चांदी के सिक्के आज भी हमें बता रहे हैं कि विचार और संस्कृति अक्सर साम्राज्यों से भी लंबी यात्रा करते हैं।