रोहनिया सीट: अपना दल के उदय से लेकर दबदबे तक की पूरी कहानी

वाराणसी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली रोहनिया विधानसभा सीट पूर्वांचल की सबसे चर्चित और हॉट सीटों में शुमार की जाती है। मौजूदा परिसीमन के बाद वजूद में आई इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव 2012 में हुआ था। तब से लेकर अब तक के चार चुनावों में इस सीट का सियासी मिजाज लगातार बदलता रहा है, जहां क्षेत्रीय दलों से लेकर राष्ट्रीय पार्टियों तक ने अपनी ताकत दिखाई है।
रोहनिया सीट का अब तक का चुनावी सफर (2012–2022)
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2012 (पहला चुनाव): नए परिसीमन के बाद हुए पहले चुनाव में अपना दल की संस्थापक डॉ. एस. पटेल की बेटी अनुप्रिया पटेल ने शानदार जीत दर्ज की। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के रमाकांत सिंह को 17,583 वोटों के अंतर से हराया था। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में अनुप्रिया मिर्जापुर से सांसद चुन ली गईं।
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2014 (उपचुनाव): अनुप्रिया के सांसद बनने के बाद खाली हुई इस सीट पर हुए उपचुनाव में सियासी समीकरण बदले। समाजवादी पार्टी के महेंद्र सिंह पटेल ने अपना दल की कृष्णा पटेल को करीब 14,449 वोटों से हराकर यह सीट सपा के पाلي में कर ली।
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2017 (भाजपा की बड़ी जीत): उत्तर प्रदेश में प्रचंड मोदी लहर के बीच 2017 के चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर कब्जा जमाया। भाजपा उम्मीदवार सुरेंद्र नारायण सिंह ने सपा के महेंद्र सिंह पटेल को 57,553 वोटों के भारी अंतर से शिकस्त दी।
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2022 (अपना दल-एस की वापसी): 2022 के विधानसभा चुनाव में यह सीट एनडीए गठबंधन के तहत अपना दल (सोनेलाल) के खाते में गई। पार्टी के उम्मीदवार डॉ. सुनील पटेल ने अपने ही धड़े के विरोधी दल (अपना दल-कमेरावादी के अभय पटेल) को 46,472 वोटों से हराकर जीत दर्ज की।
जातीय समीकरण और राजनीतिक महत्व
रोहनिया विधानसभा क्षेत्र को मुख्य रूप से पटेल (कुर्मी) बहुल सीट माना जाता है, यही वजह है कि यहां ‘अपना दल’ के दोनों धड़ों और अन्य पार्टियों की रणनीति इसी सामाजिक ताने-बाने के इर्द-गिर्द घूमती है। इसके अलावा ब्राह्मण, भूमिहार, और दलित मतदाता भी यहां हार-जीत तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी का हिस्सा होने के कारण इस सीट पर राजनीतिक दलों का विशेष फोकस रहता है।
पिछले दो विधानसभा चुनावों (2017 और 2022) के परिणाम बताते हैं कि भाजपा और अपना दल (सोनेलाल) का गठबंधन इस क्षेत्र में बेहद मजबूत स्थिति में रहा है, लेकिन 2014 के उपचुनाव के नतीजे यह भी साबित करते हैं कि रोहनिया के मतदाता स्थानीय समीकरणों के आधार पर चौंकाने वाले फैसले लेने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
