बलिया की रसड़ा सीट क्यों है खास? 2022 में बसपा ने यहीं दर्ज की थी जीत

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अपनी गोटियां बिछानी शुरू कर दी हैं। राज्य की 403 विधानसभा सीटों पर सामाजिक और जातीय समीकरण साधे जा रहे हैं। पूर्वांचल के बलिया जिले की सात विधानसभा सीटों में रसड़ा (Rasra) का सियासी मिजाज सबसे जुदा रहा है। यह वही सीट है, जिसने 2022 के विधानसभा चुनाव में प्रचंड मोदी-योगी लहर और सपा के उभार के बीच पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (BSP) का इकलौता खाता खोलकर पार्टी की साख बचाई थी।
1957 में अस्तित्व में आई रसड़ा सीट पहले द्वि-सदस्यीय थी, जहां कांग्रेस के गंगा प्रसाद सिंह और राम रतन ने जीत हासिल की थी। इसके बाद से यहां भाकपा, कांग्रेस, जनता पार्टी, जनता दल, भाजपा और बसपा के बीच दिलचस्प चुनावी मुकाबले देखने को मिले हैं।
जातीय समीकरण: दलित और राजभर मतदाता सबसे निर्णायक
रसड़ा विधानसभा सीट पर चुनावी जीत-हार तय करने में सामाजिक गोलबंदी का बड़ा हाथ रहता है। यहां विभिन्न वर्गों की हिस्सेदारी इस प्रकार है:
-
अनुसूचित जाति (SC): करीब 26% (सीट पर सबसे बड़ा मतदाता वर्ग)
-
राजभर: लगभग 15%
-
मुस्लिम: करीब 12%
-
यादव: लगभग 11%
-
राजपूत (क्षत्रिय): लगभग 10%
-
वैश्य: लगभग 6%
-
चौहान (नोनिया): लगभग 5%
-
कुशवाहा (मौर्य): लगभग 4%
-
ब्राह्मण: लगभग 3%
-
अन्य जातियां: शेष मतदाता अन्य समुदायों से आते हैं।
दलित, राजभर, मुस्लिम और राजपूत मतदाताओं का गठजोड़ यहां किसी भी उम्मीदवार की जीत का मुख्य आधार बनता है।
भाकपा, कांग्रेस और जनता पार्टी का दौर
1962 में यहां पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के रघुनाथ ने कांग्रेस को हराकर जीत दर्ज की। 1967 और 1969 में कांग्रेस के राम रतन ने दोबारा वापसी की। 1974 में एक बार फिर भाकपा के रघुनाथ विजयी हुए।
आपातकाल के बाद 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की लहर के दौरान मन्नू राम ने भाकपा प्रत्याशी को मात्र 698 वोटों से हराकर जनता पार्टी का खाता खोला। हालांकि, 1980 और 1985 में कांग्रेस के हरदेवा (हर देव) और 1989 में कांग्रेस के राम बचन ने लगातार जीत दर्ज कर कांग्रेस का दबदबा बनाए रखा।
90 का दशक: राजनीतिक बदलाव और BSP का उदय
1989 के बाद यूपी की सियासत में आए बदलाव का असर रसड़ा पर भी दिखा:
-
1991: पहली बार जनता दल (JD) के घुराबू ने कांग्रेस के राम बचन को हराकर सीट जीती।
-
1993: बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार यहां कदम जमाया और घूरा राम विधायक बने। उन्होंने भाजपा के अनिल को हराया।
-
1996: भारतीय जनता पार्टी के अनिल कुमार ने 49,766 वोट पाकर पहली बार भाजपा का परचम लहराया और बसपा के घूरा राम को मात दी।
2002 से 2022: दो दशक से रसड़ा पर BSP का अटूट कब्जा
2002 के बाद से यह सीट पूरी तरह से बसपा का अभेद्य किला बन गई। पिछले पांच चुनावों में लगातार हाथी का ही दबदबा रहा है:
-
2002 और 2007 (घूरा राम की वापसी): 2002 में बसपा के घूरा राम ने सपा के घूरा को 10,018 वोटों से हराया। 2007 में उन्होंने लगातार दूसरी बार भाजपा के अनिल कुमार को 3,309 वोटों से हराकर सीट बरकरार रखी।
-
2012 (उमाशंकर सिंह की एंट्री): बसपा ने चेहरा बदलते हुए उमाशंकर सिंह को मैदान में उतारा। उमाशंकर सिंह ने सपा के सनातन पांडेय को 52,825 वोटों के भारी अंतर से हराकर रिकॉर्ड जीत दर्ज की।
-
2017 (मोदी लहर में भी जीत): 2017 में जब पूरे प्रदेश में भाजपा की आंधी थी, तब भी उमाशंकर सिंह ने 92,272 वोट हासिल किए और भाजपा के राम इकबाल सिंह को 33,887 वोटों से हराया।
-
2022 (पूरे यूपी में सिर्फ एक सीट): 2022 के चुनाव में जब बसपा पूरे राज्य से लगभग साफ हो गई थी, तब रसड़ा से उमाशंकर सिंह ने 87,887 वोट हासिल कर सुभासपा (SBSP) के महेंद्र को 6,583 वोटों से मात दी और अपनी हैट्रिक पूरी की।
