हरिश्चंद्र बोले- ‘जनता को सिर्फ वोट बैंक न समझे सरकार, संवाद बेहद जरूरी’

लखनऊ: उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में यूजीसी (UGC) के निर्णयों, उच्च शिक्षा और एससी-एसटी (SC-ST) आरक्षण को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच, नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP – अजीत गुट) के उत्तर प्रदेश प्रदेश अध्यक्ष हरिश्चंद्र सिंह ने एक बयान जारी कर राजनीतिक दलों और सरकारों को नसीहत दी है। उन्होंने कहा है कि आज का राजनीतिक परिदृश्य धीरे-धीरे साफ हो रहा है और उत्तर प्रदेश केवल सत्ता की राजनीति का केंद्र नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, प्रतिनिधित्व और आरक्षण जैसे अहम मुद्दों की निर्णायक भूमि है।
‘आरक्षण विरोध का विषय नहीं, संवैधानिक माध्यम है’
हरिश्चंद्र सिंह ने कहा कि यूजीसी से जुड़े फैसलों, उच्च शिक्षा के अवसरों और आरक्षण को लेकर उठ रहे सवालों को केवल राजनीतिक शोर या विरोध-प्रदर्शन मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इन चिंताओं के पीछे वे लाखों युवा और परिवार हैं, जो शिक्षा व रोजगार में अपने संवैधानिक अधिकारों और समान अवसरों की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आरक्षण किसी के खिलाफ कोई हथियार नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक असमानताओं को पाटने और कम करने का एक संवैधानिक माध्यम है। इसलिए इस विषय पर संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर संविधान, समान अवसर और सामाजिक न्याय के व्यापक दृष्टिकोण से चर्चा होनी चाहिए।
दिल्ली और लखनऊ को दी नसीहत
केंद्र और राज्य सरकारों पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि दशकों बाद उत्तर प्रदेश को एक मजबूत राजनीतिक नेतृत्व जरूर मिला है, लेकिन आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या दिल्ली की राजनीतिक प्राथमिकताएं उत्तर प्रदेश की जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं पर भारी पड़ेंगी?
उन्होंने कहा कि सत्ता सिर्फ चुनाव जीतने से नहीं चलती, बल्कि इसके लिए सामाजिक विश्वास, खुला संवाद और न्याय की भावना का होना अनिवार्य है। यदि आरक्षण या सामाजिक प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों को लेकर समाज के भीतर आशंकाएं जन्म ले रही हैं, तो सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह आगे आकर संवाद करे और अपने नीतिगत निर्णयों की पारदर्शी समीक्षा करे।
‘उत्तर प्रदेश का समाज अब मौन नहीं है’
एनसीपी नेता ने चेताया कि उत्तर प्रदेश का समाज अब पहले की तरह शांत और मौन नहीं रहने वाला है। आज का युवा और आम नागरिक अपने अधिकारों, अपने प्रतिनिधित्व और अपने सुरक्षित भविष्य पर खुलकर सवाल पूछ रहा है।
आगामी चुनावों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि साल 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे और इसके बाद साल 2029 की राष्ट्रीय राजनीति का रास्ता भी काफी हद तक यहीं से तय होकर जाएगा। इसलिए दिल्ली और लखनऊ दोनों को यह बात समझनी होगी कि जनता को केवल एक ‘वोट बैंक’ न समझा जाए। लोकतंत्र में जनता की आवाज ही सबसे बड़ी और निर्णायक शक्ति होती है।
