6000 नदियां, 83 हजार MW क्षमता फिर भारत से बिजली क्यों लेता है नेपाल?

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अजमल शाह
अजमल शाह

नई दिल्ली: भारत, नेपाल में बिजली की कमी को दूर करने के लिए वहां बिजली की सप्लाई बढ़ाने पर विचार कर रहा है। भारतीय अधिकारी मौजूदा नियमों और व्यवस्थाओं के तहत अतिरिक्त बिजली के अनुरोध पर काम कर रहे हैं। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब नेपाल भीषण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहा है। पहली नजर में यह बात हैरान करने वाली लग सकती है कि जिस देश में 6,000 से अधिक नदियां और धाराएं हैं और अनुमानित जल विद्युत क्षमता 83,000 मेगावाट है, उसे भारत से बिजली क्यों आयात करनी पड़ती है।

जल विद्युत की भारी क्षमता और जमीनी हकीकत

नेपाल जल विद्युत उत्पादन के लिए दुनिया के सबसे उपयुक्त देशों में से एक है। पहाड़ी इलाकों और अनगिनत नदियों के कारण इसकी क्षमता लगभग 83,000 मेगावाट आंकी गई है। हालांकि, क्षमता का मतलब इंस्टॉल्ड कैपेसिटी नहीं होता। नेपाल में अभी केवल 4,300 मेगावाट के आसपास ही इंस्टॉल्ड जेनरेशन कैपेसिटी है, जो कुल क्षमता का एक बहुत छोटा हिस्सा है। बड़े जल विद्युत प्रोजेक्ट्स के निर्माण के लिए भारी-भरकम निवेश, आधुनिक तकनीक, मजबूत ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर और कई वर्षों के निर्माण कार्य की जरूरत होती है। यही वजह है कि नेपाल अपने विशाल नदी संसाधनों को रातों-रात बिजली में नहीं बदल सकता।

सर्दियों में सबसे बड़ी समस्या: ‘रन ऑफ द रिवर’ तकनीक

नेपाल द्वारा बिजली आयात करने का सबसे बड़ा कारण उसके अधिकांश जल विद्युत संयंत्रों के काम करने का तरीका है। नेपाल के कई प्रोजेक्ट्स ‘रन ऑफ द रिवर’ (Run of the River) तकनीक पर आधारित हैं। ये बड़े जलाशयों में पानी स्टोर करने के बजाय नदी के बहते पानी से सीधे बिजली बनाते हैं:

  • मानसून और गर्मी: इन महीनों में भारी बारिश और बर्फ पिघलने से नदियों का बहाव काफी बढ़ जाता है। इस दौरान नेपाल जरूरत से ज्यादा बिजली पैदा करता है और अतिरिक्त बिजली भारत को निर्यात करता है।

  • सर्दियों का मौसम: अक्टूबर से मार्च के बीच नदियों का बहाव काफी कम हो जाता है और ऊंचे पहाड़ों पर पानी जम जाता है। इस वजह से बिजली उत्पादन में 60% से 70% तक की भारी गिरावट आ जाती है, जिससे निपटने के लिए नेपाल को भारत से बिजली आयात करनी पड़ती है।

स्टोरेज प्रोजेक्ट्स की कमी

बड़े जलाशय (Storage-based) आधारित प्रोजेक्ट्स नदियों में पानी अधिक होने पर उसे जमा कर सकते हैं और मांग बढ़ने या जलस्तर कम होने पर उसका उपयोग कर सकते हैं। नेपाल के पास ऐसे प्रोजेक्ट्स काफी कम हैं, जिनमें सालभर इस तरह का उत्पादन करने के लिए पर्याप्त स्टोरेज क्षमता हो। यही कारण है कि देश का बिजली उत्पादन पूरी तरह मौसमी नदी प्रवाह पर निर्भर है, जिससे साल के एक हिस्से में सरप्लस और दूसरे हिस्से में भारी कमी की स्थिति पैदा होती है।

प्राकृतिक आपदाओं से बढ़ती मुश्किलें

नेपाल की कठिन हिमालयी भौगोलिक स्थिति उसके एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को बाढ़, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं के प्रति बेहद संवेदनशील बनाती है। हाल ही में तिब्बत-नेपाल सीमा के पास आई भयानक बाढ़ और ग्लेशियर फटने की घटनाओं से हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स और सोलर प्लांटों को भारी नुकसान पहुंचा था, जिससे लगभग 550 मेगावाट (देश की कुल क्षमता का लगभग 8%) उत्पादन क्षमता अस्थायी रूप से प्रभावित हुई। उत्पादन में अचानक आई इस कमी ने नेपाल की तात्कालिक बिजली जरूरत को और बढ़ा दिया।

भारत और नेपाल के बीच द्विपक्षीय बिजली व्यापार

यह सोचना गलत होगा कि नेपाल हमेशा सिर्फ भारत से बिजली खरीदता है। दोनों देशों के बीच बिजली का यह रिश्ता अब एक संतुलित व्यापार में बदल चुका है:

  • निर्यात (Export): गर्मियों और मानसून के मौसम में जब नेपाल में भरपूर पानी होता है, तब वह अतिरिक्त बिजली भारत को बेचता है। वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान नेपाल ने भारत को लगभग 3,299 मिलियन यूनिट बिजली एक्सपोर्ट की थी।

  • आयात (Import): सर्दियों में जब हाइड्रो उत्पादन घट जाता है, तो नेपाल भारत से बिजली आयात करता है। इसी वित्त वर्ष के दौरान भारत ने नेपाल को लगभग 1,451 मिलियन यूनिट बिजली भेजी।

मौसमी बदलावों और आपदाओं के बीच भारत और नेपाल का यह ऊर्जा सहयोग दोनों देशों के आपसी संबंधों की मजबूती को दर्शाता है।