लाला बीजेपी के लिए लड़ता रहा, बीजेपी जीत गई… फिर लाला ही हार गया।

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ASHISH SHARMA RISHI
ASHISH SHARMA RISHI

लखनऊ की राजनीति बड़ी अजीब चीज है। चुनाव आता है तो गलियां अचानक महत्वपूर्ण हो जाती हैं, नुक्कड़ लोकतंत्र का मंच बन जाते हैं और मोहल्ले के वे चेहरे, जिन्हें सामान्य दिनों में कोई पहचानता तक नहीं, अचानक ‘पार्टी के सबसे मजबूत कार्यकर्ता’ बन जाते हैं। झंडा उठाने वाला अपना होता है, नारा लगाने वाला अपना होता है, बूथ तक वोटर पहुंचाने वाला अपना होता है और जो रात-दिन पार्टी के लिए घूमता है, वह तो बाकायदा ‘परिवार’ का हिस्सा होता है। लेकिन चुनाव बीतते ही राजनीति की इस पारिवारिक परिभाषा में बड़ा बदलाव आ जाता है। कौन अपना था, कौन था ही नहीं, यह सब धीरे-धीरे याददाश्त से निकलने लगता है।

आचार्य नरेंद्र देव वार्ड की कहानी इसी बदलती याददाश्त का एक कड़वा पन्ना है। 2023 के नगर निकाय चुनाव में वार्ड नंबर 99 से बीजेपी के मनीष रस्तोगी चुनाव जीते थे। बीजेपी के लिए यह जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि पार्टी इस इलाके में वापसी की कोशिश में थी और आखिरकार उसे सफलता मिली। चुनाव के दौरान बहुत से युवा पार्टी के साथ खड़े हुए। उन्हीं में एक था कंघी टोला का लाला। न कोई बड़ा पद, न कोई राजनीतिक रसूख, न कोई ऐसा परिचय कि लखनऊ की राजनीति में उसका नाम लिया जाए। नौकरी करता था, अपना घर चलाता था, लेकिन बीजेपी के लिए उसकी प्रतिबद्धता ऐसी थी कि पार्टी की बात पर बहस तक कर लेता था और कई बार बहस इतनी गर्म हो जाती थी कि बात हाथापाई तक पहुंचने की नौबत आ जाती थी। फिर भी वह लगा रहता था। उसे भरोसा था कि बीजेपी जीतेगी तो उसके जैसे लोगों का भी भला होगा।

लाला की उम्मीद बहुत बड़ी नहीं थी। उसे मंत्री नहीं बनना था, विधायक नहीं बनना था और न ही कोई सरकारी कुर्सी चाहिए थी। उसकी उम्मीद बहुत सीधी थी। गली ठीक हो जाए, पानी की सप्लाई बेहतर हो जाए, इलाके की हालत सुधरे और उसके बच्चों की जिंदगी उससे थोड़ी अच्छी हो जाए। शायद यही वजह थी कि वह पार्टी के साथ इतना मजबूती से खड़ा था। उसके लिए बीजेपी सिर्फ एक राजनीतिक दल नहीं थी, बल्कि अपने और अपने परिवार के बेहतर भविष्य की उम्मीद थी।

फिर चुनाव हुआ। बीजेपी जीती। जश्न हुआ। जीत की खुशी मनाई गई। समर्थकों की तस्वीरें आईं। बधाइयां हुईं। लेकिन उसी जीत के कुछ समय बाद लाला की जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा हो गया। सराय माली खां के पास सड़क दुर्घटना में उसकी मौत हो गई। चुनाव खत्म हो चुका था और जिस आदमी ने चुनाव के दौरान पार्टी के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी, वह खुद जिंदगी की लड़ाई हार गया।

इसके बाद जो सवाल सामने आता है, वह किसी चुनावी नतीजे का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि लाला के घर कौन पहुंचा? परिवार के मुताबिक, उसकी मौत के बाद कोई बीजेपी नेता संवेदना व्यक्त करने नहीं पहुंचा। न कोई बड़ा आयोजन चाहिए था, न भाषण, न मीडिया और न ही किसी मंच की जरूरत थी। बस किसी को उसके घर जाकर उसके परिवार से यह कहने की जरूरत थी कि लाला चला गया है, लेकिन वह अकेला नहीं था और उसके परिवार को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ समय बाद लाला की मां भी चल बसीं। अब उसके पिता भी नहीं रहे। पीछे बची उसकी पत्नी और तीन छोटे बच्चे। सोचिए, जिस आदमी की उम्मीद थी कि राजनीति बदलने से उसके परिवार की जिंदगी बदलेगी, आज उसके बच्चे दो वक्त की रोटी और अपने भविष्य के लिए सहारे की तलाश में हैं। जिस घर में कभी लाला बीजेपी के लिए बहस किया करता था, आज उसी घर में उसका परिवार यह देख रहा है कि चुनाव खत्म होने के बाद उसके हिस्से में आखिर क्या आया।

और यहीं राजनीति का सबसे बड़ा व्यंग्य खड़ा होता है। आज भी अगर लाला का जिक्र होता है तो लोग कहते हैं, ‘लाला तो बीजेपी के लिए बहुत किया करता था।’ करता था! यही दो शब्द शायद पूरी कहानी का सबसे बड़ा तंज हैं। करता था, इसलिए याद है। अब नहीं करता, इसलिए शायद जरूरत भी नहीं रही। लेकिन लाला के तीन बच्चे तो हैं। वे आज भी हैं। उनकी भूख आज भी है। उनकी पढ़ाई आज भी है। उनकी जिंदगी आज भी है। उनके सिर पर पिता का हाथ नहीं है, मां अकेली है और दादा-दादी का सहारा भी खत्म हो चुका है।

चुनाव के समय कार्यकर्ता पार्टी की ताकत होता है। उसकी मेहनत वोट में दिखाई देती है, उसकी दौड़-भाग बूथ पर दिखाई देती है, उसकी मौजूदगी भीड़ में दिखाई देती है और उसकी निष्ठा जीत के आंकड़ों में दिखाई देती है। लेकिन चुनाव के बाद वही कार्यकर्ता अगर सड़क हादसे में मर जाए तो उसकी निष्ठा का हिसाब कौन रखता है? क्या कार्यकर्ता सिर्फ उस दिन तक परिवार है, जिस दिन तक उससे वोट जुटाने का काम लिया जा रहा है?

राजनीति में ‘कार्यकर्ता परिवार है’ कहना बहुत आसान है। मुश्किल यह साबित करना है कि वह सच में परिवार है। परिवार की पहचान शादी-ब्याह के निमंत्रण से नहीं होती, मुसीबत के समय होती है। किसी कार्यकर्ता की मौत के बाद उसके घर जाकर बैठना, उसकी पत्नी का हाल पूछना, उसके बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछना और यह देखना कि परिवार दो वक्त की रोटी के लिए परेशान तो नहीं है, शायद किसी बड़े राजनीतिक भाषण से कहीं ज्यादा अर्थ रखता है।

लाला ने पार्टी से क्या मांगा था? कोई टिकट नहीं। कोई पद नहीं। कोई ठेका नहीं। कोई कुर्सी नहीं। वह सिर्फ यह मानकर चल रहा था कि जिस पार्टी के लिए वह खड़ा है, जरूरत पड़ने पर वह पार्टी भी उसके परिवार के साथ खड़ी होगी। यह उम्मीद गलत थी या सही, इसका फैसला अब राजनीति नहीं, समय करेगा। लेकिन सवाल आज भी खड़ा है कि उसकी मौत के बाद उसके घर तक पहुंचने में इतनी दूरी क्यों हो गई?

लाला की कहानी किसी एक नेता को कटघरे में खड़ा करने की कहानी नहीं है। यह उससे बड़ा सवाल है। यह उस राजनीतिक संस्कृति का सवाल है जहां चुनाव के दौरान कार्यकर्ता की कीमत बहुत बढ़ जाती है और चुनाव के बाद उसकी जरूरत बहुत कम हो जाती है। यह सवाल सिर्फ बीजेपी से नहीं, हर उस राजनीतिक संगठन से पूछा जाना चाहिए जो अपने कार्यकर्ताओं को ‘परिवार’ कहता है। क्योंकि परिवार शब्द मंच से बोलने के लिए बहुत सुंदर है, लेकिन उसकी असली परीक्षा उस घर के दरवाजे पर होती है जहां कमाने वाला आदमी मर चुका हो और उसके छोटे बच्चे मदद की उम्मीद में बैठे हों।

लाला की मौत को राजनीति का हथियार बनाना भी गलत होगा। उसके बच्चों की मजबूरी को किसी पोस्टर, किसी भाषण या सोशल मीडिया की तस्वीर में बदलना उससे भी बड़ा अन्याय होगा। जरूरत सिर्फ इतनी है कि अगर सच में लाला पार्टी के लिए इतना महत्वपूर्ण था, अगर वह सच में उन लोगों में था जिन्होंने पार्टी को जमीन पर खड़ा करने में अपना समय और ताकत लगाई, तो उसके परिवार को यह महसूस न हो कि चुनाव खत्म होते ही उनके पिता की राजनीतिक उपयोगिता भी खत्म हो गई।

क्योंकि चुनाव की जीत का जश्न एक रात चलता है, लेकिन किसी परिवार की मुसीबत सालों चलती है। माला सूख जाती है, बैनर उतर जाते हैं, नारे बंद हो जाते हैं और चुनावी गाड़ियां दूसरी गली में चली जाती हैं। लेकिन एक विधवा पत्नी और तीन छोटे बच्चों की जिंदगी वहीं रहती है, जहां लाला उन्हें छोड़ गया।

और शायद यही इस पूरी कहानी का सबसे तीखा सवाल है। लाला बीजेपी के लिए लड़ता रहा। बीजेपी चुनाव जीत गई। लाला जिंदगी हार गया। अब उसके तीन बच्चे पूछ रहे हैं कि जिस पार्टी को उनके पिता अपना परिवार समझते थे, उस परिवार में उनके लिए जगह कहां है?

क्योंकि राजनीति में जीत सिर्फ चुनाव जीतने से पूरी नहीं होती। कभी-कभी जीत के बाद यह साबित करना पड़ता है कि जिन लोगों ने आपके लिए लड़ाई लड़ी थी, उनकी जिंदगी आपके लिए सिर्फ वोट की गिनती नहीं थी।

लाला की कहानी का फैसला किसी अखबार को नहीं करना है। कोई कॉलम भी नहीं करेगा। फैसला उस दिन होगा जब उसके बच्चे बड़े होकर अपने पिता की तस्वीर के सामने बैठेंगे और पूछेंगे कि पापा जिस पार्टी के लिए इतना किया करते थे, उसने पापा के जाने के बाद उनके परिवार के लिए क्या किया था।