चीन की नई शर्तों से भारत के सोलर मिशन पर कितना असर पड़ेगा?

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

पूरी दुनिया जहां ऊर्जा के पारंपरिक स्रोतों को छोड़कर वैकल्पिक और सौर ऊर्जा (Solar Energy) की ओर तेजी से कदम बढ़ा रही है, वहीं इस क्षेत्र में दबदबा रखने वाले चीन ने एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला लिया है। चीन ने सौर ऊर्जा से जुड़े उपकरण बनाने में इस्तेमाल होने वाली अपनी 12 तकनीकों पर निर्यात नियंत्रण (Export Control) लगाने का प्रस्ताव रखा है। इस सूची में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और बायोटेक्नोलॉजी भी शामिल हैं। चीन के इस कदम ने भारत समेत दुनिया के तमाम देशों, विशेषकर अमेरिका की चिंता बढ़ा दी है।

चीन ने सुरक्षा का दिया हवाला, क्या है असली मकसद?

बीते शुक्रवार को जारी एक बयान में चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने फोटोवोल्टिक (Photovoltaic) तकनीकों को निर्यात-नियंत्रण सूची में शामिल करने का प्रस्ताव दिया। मंत्रालय ने इसके पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए कहा कि इन तकनीकों का इस्तेमाल एयरोस्पेस और राष्ट्रीय रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रहा है।

हालांकि, जानकारों का मानना है कि चीन इस क्षेत्र में अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहता है। इसका सीधा असर टेस्ला (Tesla) जैसी अमेरिकी कंपनियों पर भी पड़ेगा, जो अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना बना रही थीं।

किन-किन तकनीकों पर लग सकती है रोक?

चीन ने जिन अत्याधुनिक तकनीकों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी शुरू कर दी है, उनमें शामिल हैं:

  • पतले वेफर्स, पेरोव्स्काइट (Perovskite) और टैन्डम सौर सेल बनाने की तकनीक।

  • बड़े पैमाने पर पॉलीसिलिकॉन उत्पादन के लिए द्रवीकृत-बिस्तर तकनीक (Fluidized-bed technology), जो सीमेंस प्रक्रिया से कम खर्चीली और अधिक ऊर्जा-कुशल है।

  • उन्नत सौर सेल निर्माण तकनीकें (TOPCon, HJT और XBC), हालांकि इन पर आंशिक प्रतिबंध रहेगा।

निर्यातकों को अब नियंत्रण सूची के औपचारिक रूप से लागू होने तक कुछ विदेशी प्रौद्योगिकी हस्तांतरणों का पंजीकरण कराना होगा। इस प्रस्ताव पर सार्वजनिक परामर्श 15 नवंबर को समाप्त हो रहा है।

भारत पर क्या होगा इस प्रतिबंध का असर?

भारत के लिए यह खबर एक बड़ा झटका साबित हो सकती है, क्योंकि बीजिंग ने भारत को सोलर-निर्माण तकनीक के निर्यात पर भी कथित तौर पर रोक लगा दी है। भारत के घरेलू उद्योग पर इसके कई गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं:

  • तकनीक की दौड़ में पिछड़ने का डर: भारतीय सौर उद्योग फिलहाल PERC और TOPCon जैसी तकनीकों पर केंद्रित है। पेरोव्स्काइट जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों पर पाबंदी से भारत के लिए नई तकनीक हासिल करना कठिन हो जाएगा।

  • परियोजनाओं में देरी: सोलर मशीनरी, तकनीकी डिजाइन और विशेषज्ञता की कमी के कारण नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना और उत्पादन में देरी हो सकती है, जिससे भारत की महत्वाकांक्षी सौर परियोजनाओं की समयसीमा और लागत बढ़ जाएगी।

  • महंगा होगा उत्पादन: चीनी तकनीक और मशीनरी तक पहुंच सीमित होने से भारतीय निर्माताओं को दूसरे देशों का रुख करना पड़ेगा या अपनी तकनीक विकसित करने में भारी निवेश करना होगा। इससे अनुसंधान एवं विकास (R&D) का खर्च बढ़ेगा और उत्पादन महंगा हो जाएगा।

  • छोटे निर्माताओं पर मार: बड़े उद्योगों की तुलना में छोटे और मध्यम सोलर उपकरण निर्माताओं के लिए महंगी मशीनरी खरीदना मुश्किल होगा। इससे कई इकाइयों का विस्तार रुक सकता है या उत्पादन घटाने की नौबत आ सकती है।

भारत के लिए आगे क्या है रास्ता?

चीन के इस कदम से निपटने के लिए भारत को केवल सोलर पैनल असेंबल करने की मानसिकता से बाहर आना होगा। भारत को घरेलू अनुसंधान, मशीनरी निर्माण, पॉलीसिलिकॉन और सिलिकॉन वेफर के उत्पादन में अपनी आत्मनिर्भरता बढ़ानी होगी। इसके अलावा, अन्य देशों के साथ तकनीकी सहयोग बढ़ाकर एक वैकल्पिक और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) विकसित करनी होगी।