अमेरिकी संसद में भारतवंशियों की ताकत, जानिए क्या है ‘समोसा कॉकस’

अमेरिका के मध्यावधि (Midterm) चुनावों में भारतीय मूल के नेताओं की जीत और राजनीतिक भागीदारी के साथ ही एक बार फिर ‘समोसा कॉकस’ (Samosa Caucus) चर्चा के केंद्र में आ गया है। फ्लोरिडा से पिया डांडिया की ऐतिहासिक जीत के बाद इस अनौपचारिक समूह का जिक्र तेजी से बढ़ा है। सवाल यह है कि आखिर ‘समोसा कॉकस’ क्या है, इसका नाम भारतीय नाश्ते ‘समोसे’ पर क्यों रखा गया और अमेरिकी संसद में इसकी क्या भूमिका है?
क्या है समोसा कॉकस और कहां से आया यह नाम?
अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के सांसदों के अनौपचारिक समूह को ‘समोसा कॉकस’ के लोकप्रिय नाम से जाना जाता है। यह कोई आधिकारिक संसदीय समिति या संवैधानिक संस्था नहीं है, बल्कि इसका इस्तेमाल उन भारतीय-अमेरिकी नेताओं के लिए किया जाता है जो अमेरिकी राजनीति में निर्वाचित होकर प्रतिनिधि सभा या सीनेट तक पहुंचे हैं।
अमेरिकी राजनीति में ‘कॉकस’ शब्द का इस्तेमाल ऐसे समूह के लिए होता है, जहां सांसद किसी साझा मुद्दे, राजनीतिक उद्देश्य या समुदाय से जुड़े हितों पर चर्चा और सहयोग करते हैं। इसी संदर्भ में भारतीय मूल के अमेरिकी सांसदों के इस समूह को ‘समोसा कॉकस’ कहा जाने लगा।
इस नाम की शुरुआत वर्ष 2018 के आसपास मानी जाती है, जिसे मुख्य रूप से अमेरिकी सांसद राजा कृष्णमूर्ति से जोड़ा जाता है। समोसा भारतीय खानपान की बेहद लोकप्रिय पहचान है। इस अनूठे नाम के जरिए भारतीय मूल के इन नेताओं ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों और अमेरिकी राजनीतिक पहचान के मेल को एक हल्के-फुल्के और सकारात्मक अंदाज में सामने रखा है।
पीएम मोदी भी कर चुके हैं इसका जिक्र
जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए ‘समोसा कॉकस’ का विशेष रूप से उल्लेख किया था। उन्होंने कहा था कि भारतीय जड़ों वाले कई अमेरिकी नागरिकों ने राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है और उनमें से कई सदन में भी मौजूद हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने मजाकिया अंदाज में कहा था कि उन्हें बताया गया है कि ‘समोसा कॉकस’ सदन में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और उन्हें उम्मीद है कि यह समूह और आगे बढ़ेगा। उनके इस संबोधन के बाद इस शब्द को भारत में भी व्यापक पहचान और चर्चा मिली।
इस समूह के प्रमुख चेहरे और पिया डांडिया की जीत
समोसा कॉकस से जुड़े प्रमुख भारतीय-अमेरिकी नेताओं में रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, अमी बेरा, राजा कृष्णमूर्ति, सुहास सुब्रमण्यम और श्री थानेदार जैसे नाम शामिल हैं। इन नेताओं की राजनीतिक प्राथमिकताएं और विचारधाराएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन उनकी भारतीय जड़ें और अमेरिकी राजनीति में उनकी मौजूदगी इन्हें इस अनौपचारिक पहचान से जोड़ती है। ये सभी शिक्षा, स्वास्थ्य, आव्रजन, तकनीक, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति जैसे अहम मुद्दों पर काम करते हैं।
हालिया मिडटर्म चुनाव में फ्लोरिडा के 22वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से पिया डांडिया की जीत के बाद इस समूह के विस्तार की चर्चा फिर तेज हो गई है। रिपब्लिकन उम्मीदवार को हराकर अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में जगह बनाने वाली पिया डांडिया इस अनौपचारिक समूह को और मजबूती देती हैं।
क्या भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है यह कॉकस?
समोसा कॉकस का महत्व केवल भारतीय मूल के सांसदों की संख्या तक सीमित नहीं है। अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय-अमेरिकी नेताओं की उपस्थिति से भारत से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के लिए एक अतिरिक्त और सहज मंच उपलब्ध होता है। इनमें भारत-अमेरिका व्यापार, तकनीकी सहयोग, रक्षा संबंध, आव्रजन और भारतीय पेशेवरों के H-1B वीजा जैसे विषय शामिल हैं।
हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह सोचना सही नहीं होगा कि भारतीय मूल का हर अमेरिकी सांसद हमेशा भारत सरकार की नीतियों का समर्थन ही करेगा। अमेरिकी सांसदों की पहली और मुख्य राजनीतिक जवाबदेही अपने निर्वाचन क्षेत्र और वहां के मतदाताओं के प्रति होती है। भारत से जुड़े मुद्दों पर उनके विचार उनकी पार्टी, राजनीतिक सोच और क्षेत्रीय हितों के अनुसार भिन्न हो सकते हैं।
अमेरिकी राजनीति में बढ़ती भारतीय-अमेरिकी पहचान
‘समोसा कॉकस’ अमेरिकी समाज में भारतीय मूल के लोगों की बढ़ती राजनीतिक सक्रियता का एक बड़ा प्रतीक बन गया है। कभी कारोबार, तकनीक और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों तक सीमित रहने वाला यह समुदाय अब स्थानीय और राष्ट्रीय राजनीति में भी अपनी मजबूत छाप छोड़ रहा है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय मूल के ये नेता अमेरिकी कांग्रेस में कितनी गहरी पैठ बनाते हैं और अपने निर्वाचन क्षेत्रों के साथ-साथ व्यापक राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान में किस तरह अपना योगदान देते हैं।

