मोदी के साथ राहुल DPM और योगी के साथ अखिलेश डिप्टी CM बनें तो?

कल्पना कीजिए एक ऐसी सुबह, जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बगल में उप प्रधानमंत्री राहुल गांधी बैठे हों और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बगल में उप मुख्यमंत्री अखिलेश यादव। देश और प्रदेश दोनों में ‘विरोधी सहयोग’ का ऐसा प्रयोग, जिसकी कल्पना सुनकर राजनीतिक विश्लेषक भी चाय की चुस्की लेते-लेते हंसने लगें।
सबसे पहले दिल्ली का दृश्य देखिए। सुबह की कैबिनेट मीटिंग। मोदी जी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात कर रहे हैं। राहुल गांधी तुरंत बीच में बोल पड़ते हैं, “मोदी जी, सबका साथ तो ठीक है, लेकिन पहले ये बताइए कि ईवीएम का साथ कब छूट रहा है?” मोदी जी मुस्कुराते हुए कहते हैं, “राहुल जी, अब आप भी सरकार में हैं। ईवीएम आपकी भी है।” राहुल गांधी कुछ सेकंड सोचते हैं और फिर कहते हैं, “तो फिर बैलेट पेपर भी रख लो, दोनों का मिला-जुला सिस्टम। लोकतंत्र का नया मॉडल!”
विदेश नीति की बैठक में मोदी जी रणनीतिक स्वायत्तता की बात करते हैं। राहुल गांधी तुरंत फाइल खोलकर कहते हैं, “चीन से बात करनी चाहिए। और पाकिस्तान से भी। और अमेरिका से भी। सबसे बात करनी चाहिए।” मोदी जी शांत स्वर में जवाब देते हैं, “राहुल जी, बात तो हम भी करते हैं। बस फोन पर नहीं, सीमा पर।”
अब उत्तर प्रदेश का नजारा देखिए। लखनऊ सचिवालय। योगी आदित्यनाथ कानून व्यवस्था की समीक्षा कर रहे हैं। अखिलेश यादव बगल में बैठे हैं। योगी जी बोलते हैं, “कानून व्यवस्था में कोई समझौता नहीं।” अखिलेश यादव तुरंत कहते हैं, “बिल्कुल सही। समझौता तो सीट बंटवारे में होना चाहिए। 200 सीटें हमें, बाकी आपको।” योगी जी की भृकुटि थोड़ी तन जाती है, “अखिलेश जी, अभी चुनाव नहीं है। अभी शासन है।” अखिलेश यादव हंसते हुए जवाब देते हैं, “योगी जी, शासन भी तो चुनाव के लिए ही होता है ना।”
विकास कार्यों की बैठक में योगी जी एक्सप्रेसवे और अस्पतालों की बात करते हैं। अखिलेश यादव बीच में बोलते हैं, “एक्सप्रेसवे ठीक है, लेकिन साइकिल ट्रैक भी बनवा दीजिए। गरीबों का भी ख्याल रखना है।” योगी जी कहते हैं, “साइकिल ट्रैक बन जाएगा। बस साइकिल पर सवार होकर प्रदर्शन न करना।” अखिलेश यादव मुस्कुराते हैं, “प्रदर्शन तो अब आपके साथ बैठकर ही कर लेंगे।”
मीडिया के सामने दोनों जोड़े एक साथ आते हैं तो दृश्य और भी रोचक हो जाता है। दिल्ली में मोदी जी और राहुल गांधी एक मंच पर खड़े होते हैं। मोदी जी बोलते हैं, “देश प्रगति कर रहा है।” राहुल गांधी तुरंत जोड़ देते हैं, “हां, प्रगति तो हो रही है… लेकिन आम आदमी को महसूस क्यों नहीं हो रही?” योगी जी और अखिलेश यादव लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। योगी जी कहते हैं, “उत्तर प्रदेश सुरक्षित है।” अखिलेश यादव कहते हैं, “सुरक्षित तो है… बस थोड़ी महंगाई कम हो जाए तो और सुरक्षित हो जाएगा।”
सरकारी फाइलों पर दोनों के हस्ताक्षर होने लगते हैं तो ऑफिसर्स की हालत खराब हो जाती है। एक फाइल पर मोदी जी लिखते हैं ‘स्वीकृत’। राहुल गांधी नीचे लिख देते हैं ‘लेकिन समीक्षा जरूरी’। योगी जी ‘तत्काल क्रियान्वयन’ लिखते हैं। अखिलेश यादव नीचे नोट लगा देते हैं ‘जनता की राय भी ली जाए’।
सोशल मीडिया पर तो तूफान आ जाता है। एक तरफ लोग लिखते हैं, “देश में अभूतपूर्व एकता।” दूसरी तरफ लोग मीम बनाते हैं, “अब विपक्ष खुद सत्ता में है, तो आरोप किस पर लगाए?” टीवी डिबेट्स में विशेषज्ञ रात-रात भर यही चर्चा करते हैं कि यह ‘महागठबंधन 2.0’ है या ‘महा उलझन 1.0’।
सच तो यह है कि ऐसा हुआ तो देश और प्रदेश दोनों में शासन चलना तो मुश्किल नहीं होगा, लेकिन बैठकें बहुत लंबी हो जाएंगी। फैसले देर से निकलेंगे, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस बहुत मजेदार होंगी। और सबसे बड़ी बात, विपक्ष की भूमिका निभाने वाला कोई नहीं बचेगा। क्योंकि विपक्ष खुद सत्ता में आ गया होगा।
ऐसे में आम आदमी सिर्फ इतना कहेगा— “सरकार तो एक हो गई, अब महंगाई भी एक हो जाए तो बात बन जाए।”

