अमा जाने दो! लड़कों का कोई मायका नहीं होता, उनके दोस्त होते हैं कड़वा सच

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ASHISH SHARMA RISHI
ASHISH SHARMA RISHI

भारतीय समाज में ‘मायका’ केवल एक मकान या पता नहीं है, बल्कि यह एक बहुत पवित्र, सुरक्षित और भावनात्मक पनाहगाह है। ससुराल में चाहे राज हो या कलह, बेटी के लिए मायके की चौखट हमेशा खुली रहती है। थोड़ी सी तल्खी हुई, सास ने ताना मारा या जीवनसाथी से अनबन हुई—तो एक वाक्य हर दर्द की दवा बन जाता है, “मैं कुछ दिन मायके जा रही हूं।” मायका वह जगह है जहां पहुंचकर एक परिपक्व स्त्री फिर से बच्ची बन जाती है; जहां रोना, शिकायत करना और बिखर जाना पूरी तरह जायज है।

लेकिन इसी चौखट के समानांतर कभी एक पुरुष के जीवन को देखिए।

लड़के का कभी कोई मायका नहीं होता। शादी होते ही उसका घर ‘ससुराल’ के मुकाबले ‘पति का घर’ बन जाता है, लेकिन वह कभी मायका नहीं कहलाता। हकीकत तो यह है कि लड़कों के हिस्से ऐसा कोई आशियाना कभी बना ही नहीं, जहां वह जिम्मेदारियों का बोझ उतारकर सिर्फ एक बेटा बनकर सुबक सके। वहां से निकलना जिम्मेदारी है, और वहां टूटकर लौटना अक्सर कमजोरी मान लिया जाता है।

‘मर्द’ बनने की अंधी शर्त और खामोश दर्द

समाज बड़े जतन से लड़कों के दिमाग में बचपन से एक सांचा ढालता है:

“तू लड़का है, लड़के रोते नहीं।”

“मर्द बन, जिम्मेदारियां संभालना सीख।”

“ससुराल और अपनी गृहस्थी में समझौता करना सीखो, पीछे लौटने का कोई रास्ता नहीं है।”

नतीजा यह होता है कि जब वही पुरुष भीतर से पूरी तरह टूटता है, जब ससुराल में मान-सम्मान की जगह उपेक्षा मिलती है, जब पत्नी और परिवार के अंतर्विरोधों के बीच वह पिसता है, या जब करियर और ईएमआई का तनाव उसका गला घोंटने लगता है—तो वह कहां जाए?

उसके पास रोने के लिए कोई मायका नहीं होता। ऐसे में वह सिर्फ एक ही जगह मुड़ता है—अपने दोस्तों की तरफ।

दोस्त: पुरुषों का एकमात्र अनौपचारिक ‘मायका’

पुरुषों के लिए उनके दोस्त ही उनका असली मायका बन जाते हैं।

ये वही दोस्त होते हैं जो कॉलेज की कैंटीन से लेकर करियर के संघर्षों तक साथ रहे। वही, जो रात के दो बजे भी बिना किसी भूमिका के फोन उठाकर कह देते हैं—”बोल क्या हुआ, कहां है तू?”

यह दोस्ती पारंपरिक मायके जैसी कोमल और दुलार भरी भले न लगे; यहां मां की तरह सिर पर ममता का हाथ नहीं फिरता और न ही कोई मीठे शब्दों में दिलासा देता है। यहां एक बेतकल्लुफ कंधा होता है, चाय की टपरी होती है, और बेझिझक बोली जाने वाली खरी-खोटी बातें होती हैं जो उस पर चढ़े ‘सफल और मजबूत पुरुष’ के भारी मुखौटे को उतार फेंकती हैं।

दोस्तों के बीच एक पुरुष को अपनी कमाई, अपने पद या अपने पारिवारिक स्टेटस का हिसाब नहीं देना पड़ता। वहां वह बिना किसी झिझक के अपनी लाचारी बयां कर सकता है।

संस्कार बनाम ‘आवारागर्दी’: समाज का दोहरा मापदंड

विडंबना यह है कि समाज इस भावनात्मक जरूरत को भी सामान्य नजर से नहीं देखता। यहां एक गहरा दोहरा मापदंड काम करता है:

  • विवाहिता का मायके जाकर हफ्तों रहना ‘परंपरा’, ‘अधिकार’ और ‘संस्कार’ माना जाता है।

  • वहीं, जब एक शादीशुदा पुरुष मानसिक शांति के लिए दोस्तों के साथ कुछ घंटे बिताता है, तो उसे ‘लापरवाही’ या ‘आवारागर्दी’ का नाम दे दिया जाता है।

  • महिला का आंसुओं में बह जाना सहानुभूति का हकदार होता है, जबकि पुरुष का बिखरना ‘नामर्दी’ या ‘कमजोरी’ करार दे दिया जाता है।

हमने पुरुषों से उनकी भावनाओं को व्यक्त करने की हर जगह छीन ली है। न कोई कानूनी सुरक्षा, न भावनात्मक ढांचा और न ही सामाजिक स्वीकार्यता। परिवार के सामने वह रो नहीं सकता क्योंकि ‘इज्जत’ और ‘मजबूती’ का भार उसी के कंधों पर है।

भावनात्मक शून्य और डिप्रेशन की ओर धकेलता समाज

जब पुरुष अपना दर्द घर के भीतर नहीं बांट पाता, तो दोस्त ही उसका भावनात्मक परिवार बन जाते हैं। लेकिन जब समाज और रिश्ते इस अंतिम पनाहगाह पर भी सवाल उठाने लगते हैं, तब पुरुष गहरे अवसाद (डिप्रेशन), चुप्पी और अलगाव में घिर जाता है।

आए दिन पुरुषों के मानसिक तनाव, टूटे रिश्तों और अप्रत्याशित आत्महत्याओं की खबरें आती हैं, तो समाज हैरान होता है। जबकि सच यह है कि हमने खुद एक इंसान से उसका इंसान होने का हक छीनकर उसे ‘लोहे का पुतला’ बनने पर मजबूर कर दिया है।

अब समय आ गया है कि इस संवेदनहीन सोच को बदला जाए। जिस तरह बेटियों को मायके का सहारा मिलना जरूरी है, उसी तरह पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य और उनकी संवेदनशील जरूरतों को भी समझा जाए। दोस्तों के साथ बिताए उनके वक्त को अपराधबोध की नजर से देखना बंद करना होगा।

आखिरकार पुरुष भी हाड़-मांस के बने इंसान हैं, कोई मशीन नहीं। और हर इंसान को कभी न कभी एक ऐसी जगह की जरूरत होती है, जहां वह बिना किसी शर्त और बिना किसी झिझक के अपना बोझ हल्का कर सके।