कैंसर के खिलाफ नई उम्मीद! मरीज के ट्यूमर के हिसाब से बनेगी वैक्सीन

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

 कैंसर के इलाज के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता सामने आई है। दवा निर्माता कंपनी मॉडर्ना (Moderna) और मर्क (Merck) द्वारा विकसित अपनी तरह की पहली कैंसर वैक्सीन ने मेलानोमा (Melanoma) के मरीजों में ट्यूमर के दोबारा लौटने की आशंका को काफी कम कर दिया है। गुरुवार को जारी एक प्रमुख स्टडी के नतीजों के अनुसार, सर्जरी के बाद दी जाने वाली मानक (Standard) थेरेपी के साथ इस वैक्सीन का इस्तेमाल करने पर दो साल के भीतर कैंसर वापस आने का जोखिम 42% तक कम हो गया।

हर मरीज के लिए खास तौर पर तैयार होती है वैक्सीन

‘इंटिसमेरान’ (intismeran) नामक इस वैक्सीन को उसी नोबेल पुरस्कार विजेता mRNA तकनीक से बनाया गया है, जिसके जरिए कोविड-19 की वैक्सीन तैयार की गई थी। इस वैक्सीन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे हर मरीज के ट्यूमर के जेनेटिक म्यूटेशन के आधार पर कस्टमाइज करके (विशेष तौर पर) बनाया जाता है।

ह्यूस्टन स्थित एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ता डॉ. हुसैन तौबी ने नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “विज्ञान जगत लंबे समय से एक बड़ी जीत की तलाश में था, और मुझे लगता है कि यह एक बड़ी सफलता है।” जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के लोम्बार्डी कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर के उप निदेशक डॉ. माइकल एटकिंस ने इसे ऑन्कोलॉजी और विज्ञान के लिए एक बड़ा कदम बताया, क्योंकि यह तकनीक भविष्य में कई अन्य प्रकार के कैंसर पर भी लागू हो सकेगी।

कैसे काम करती है ‘इंटिसमेरान’?

आमतौर पर वैक्सीन (जैसे एचपीवी या हेपेटाइटिस बी) संक्रमण को रोकने का काम करती हैं, लेकिन यह पर्सनलाइज्ड वैक्सीन सर्जरी से निकाले गए कैंसर को शरीर में दोबारा पनपने से रोकने के लिए डिजाइन की गई है। वैज्ञानिकों ने मरीज के ट्यूमर के उन खास जीन म्यूटेशन (नियोएंटीजन) की पहचान की, जो कैंसर कोशिकाओं को दोबारा बढ़ने में मदद करते हैं।

इसके बाद मरीज को तीन सप्ताह के अंतराल पर वैक्सीन की कुल नौ खुराकें दी जाती हैं। यह वैक्सीन मरीज के इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) को उन नियोएंटीजन की पहचान करने और उन पर सटीक हमला करने के लिए प्रशिक्षित करती है।

ट्रायल के नतीजे और 82% का सर्वाइवल रेट

इस स्टडी में हाई-रिस्क मेलानोमा वाले 1,100 से अधिक ऐसे लोगों को शामिल किया गया था, जिनकी ट्यूमर सर्जरी हो चुकी थी। सभी मरीजों को फॉलो-अप थेरेपी के तौर पर मर्क की इम्यूनोथेरेपी ‘कीट्रूडा’ (Keytruda) दी गई। इसके साथ ही, प्रतिभागियों को रैंडम आधार पर कस्टमाइज्ड वैक्सीन या प्लेसबो (Placebo) दिया गया।

दो साल बाद के नतीजों में देखा गया कि वैक्सीन समूह के 82% मरीज बिना कैंसर लौटे जीवन जी रहे थे, जबकि केवल कीट्रूडा लेने वाले मरीजों में यह आंकड़ा 70% रहा।

6 हफ्ते में तैयार होती है खुराक, साइड इफेक्ट भी सामान्य

स्टडी से जुड़े डॉ. तौबी ने बताया कि इस वैक्सीन के साइड इफेक्ट मुख्य रूप से बांह में दर्द और थकान जैसे थे, जो आमतौर पर mRNA कोरोना वैक्सीन लेने के बाद भी देखे जाते हैं।

वैक्सीन के निर्माण प्रक्रिया को लेकर मॉडर्ना के अध्यक्ष स्टीफन होगे ने बताया कि ट्यूमर जेनेटिक्स के विश्लेषण से लेकर मरीज के लिए सटीक वैक्सीन तैयार करने में लगभग छह सप्ताह का समय लगता है। फिलहाल कंपनी के मैसाचुसेट्स स्थित प्लांट में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही स्टडीज के लिए खुराकें तैयार की जा रही हैं। इस पर्सनलाइज्ड mRNA तकनीक का परीक्षण अब फेफड़ों (Lung), किडनी और अग्नाशय (Pancreatic) के कैंसर के लिए भी किया जा रहा है। मॉडर्ना और मर्क अब वैक्सीन की आधिकारिक मंजूरी के लिए नियामक प्राधिकरणों से बातचीत की तैयारी कर रहे हैं।