गांव सरकार के चुनाव में देरी क्यों, BJP-SP के पिछले प्रदर्शन की पूरी कहानी

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महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की आहट के बीच त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को कड़ा निर्देश देते हुए आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर हर हाल में पंचायत चुनाव संपन्न कराने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट लंबित होने को चुनाव टालने का वैध आधार नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने ओबीसी आयोग को एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।

यह फैसला 14 अक्टूबर 2026 को न्यायमूर्ति की पीठ ने दशरथ यादव और अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुनाया। कोर्ट ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किए जाने के सरकारी फैसले को रद्द करने से इनकार कर दिया, लेकिन साफ टिप्पणी की कि यह ‘स्टॉप-गैप अरेंजमेंट’ किसी भी हाल में निर्वाचित पंचायत का स्थायी विकल्प नहीं हो सकता।

ओबीसी आरक्षण और ट्रिपल टेस्ट में क्यों उलझा चुनाव?

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में देरी की सबसे बड़ी वजह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण और सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनिवार्य की गई ‘ट्रिपल टेस्ट’ प्रक्रिया रही है। स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन के अध्ययन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सटीक आंकड़े जुटाने के लिए सरकार ने 18 मई 2026 को हाईकोर्ट के निर्देश पर सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति राम अवतार सिंह की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था।

आयोग को प्रदेश के सभी 75 जिलों में रैपिड सर्वे कर आंकड़े जुटाने के लिए 6 महीने का समय दिया गया था, जिसकी मूल समयसीमा नवंबर 2026 तक थी। इसके बाद सीटों का नए सिरे से आरक्षण और मतदाता सूची का पुनरीक्षण होना था। इसी औपचारिकता और कानूनी प्रक्रिया के चलते चुनाव लगातार टलते रहे। अब हाईकोर्ट के ताजा आदेश के बाद आयोग को अपनी प्रक्रिया तेज कर एक महीने में रिपोर्ट देनी होगी।

विधानसभा चुनाव से पहले प्रशासनिक और सियासी चुनौतियां

आगामी तीन-चार महीनों में संभावित विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह चुनावी कवायद प्रशासनिक स्तर पर बेहद जटिल मानी जा रही है।

  • मतदाता और पदों का पैमाना: राज्य में करीब 12.59 करोड़ पंचायत मतदाता हैं। चुनाव के जरिए 57,694 ग्राम प्रधान, 826 ब्लॉक प्रमुख और 75 जिला पंचायत अध्यक्षों समेत हजारों सदस्यों का चुनाव होना है।

  • संसाधनों का दोहरा दबाव: एक तरफ पंचायत चुनाव के लिए मतदान कर्मियों का चयन, प्रशिक्षण और भारी पुलिस बल की तैनाती करनी होगी, वहीं दूसरी ओर कुछ ही हफ्तों बाद पूरे अमले को विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटना होगा।

  • सियासी जोखिम: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर आरक्षण और टिकट बंटवारे से पैदा होने वाले असंतोष का सीधा असर विधानसभा चुनावों पर पड़ सकता है। इसी नफा-नुकसान से बचने के लिए विपक्षी दल सरकार पर जानबूझकर पंचायत चुनाव टालने के आरोप लगाते रहे हैं।

यूपी पंचायत चुनाव 2021: जिला पंचायत अध्यक्षों के नतीजे

साल 2021 में चार चरणों में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के बाद जब 75 जिला पंचायत अध्यक्ष पदों के नतीजे आए थे, तो सत्ताधारी दल ने भारी बढ़त बनाई थी:

पार्टी / दल जीती गई जिला पंचायत अध्यक्ष सीटें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 67
समाजवादी पार्टी (SP) 05
जनसत्ता दल लोकतांत्रिक (JDL) 01 (प्रतापगढ़ – माधुरी पटेल)
निर्दलीय 02 (जौनपुर – श्रीकला रेड्डी समेत)
कुल सीटें 75

जिला पंचायत सदस्य स्तर (3,050 सीटें) पर सपा और निर्दलीयों ने अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसे क्षेत्रों में सत्ताधारी दल को कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष के अंतिम चुनाव में बीजेपी 67 सीटें जीतने में सफल रही थी। अब देखना होगा कि क्या राज्य सरकार हाईकोर्ट के तीन महीने के अल्टीमेटम का पालन करती है या इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देती है।