यूएई में ईरानी हमलों के पीछे ‘स्लीपर सेल’ का हाथ, अल नूमी का बड़ा खुलासा

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) की फेडरल नेशनल काउंसिल (FNC) में रक्षा, गृह और विदेशी मामलों की समिति के अध्यक्ष डॉ. अली राशिद अल नूमी ने ईरानी हमलों को लेकर एक गंभीर खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि इस साल की शुरुआत में हुए ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों के दौरान यूएई को कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ा था। इन हवाई हमलों को निर्देशित करने और अंजाम तक पहुंचाने में ‘स्लीपर सेल’ (sleeper cells) ने भी बड़ी मदद की थी।
सुरक्षा और सामान्य जनजीवन के बीच संतुलन
दुबई में यूएई कॉरेस्पोंडेंट्स काउंसिल को संबोधित करते हुए अल नूमी ने बताया कि हमलों के दौरान देश ने निवासियों की सुरक्षा और सामान्य जनजीवन के बीच संतुलन बनाए रखने पर ध्यान दिया। सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए जरूरी उपाय लागू किए गए, लेकिन शॉपिंग मॉल, रेस्तरां और समुद्र तटों (beaches) जैसे सार्वजनिक स्थानों को खुला रखा गया।
अल नूमी के मुताबिक, संवेदनशील स्थलों के आसपास मिसाइलों और ड्रोन को इंटरसेप्ट करना एक जटिल चुनौती थी, लेकिन इसे निवासियों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए बिना पूरा किया गया।
हमलों के बीच मॉल में देख हैरान था इजरायली परिचित
अल नूमी ने तनाव के दौरान एक इजरायली परिचित के साथ हुए वीडियो कॉल का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जब इजरायली व्यक्ति को पता चला कि मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच वह (अल नूमी) अबू धाबी के गैलेरिया मॉल में घूम रहे हैं, तो वह काफी हैरान रह गया।
अल नूमी ने कहा कि यूएई आने वाले कुछ इजरायली नागरिकों के मन में अरबों को लेकर पहले से ही पूर्व-निर्धारित धारणाएं बनी हुई थीं। लेकिन जब उन्होंने अमीराती समाज और फिलिस्तीनियों सहित विभिन्न अरब देशों के निवासियों से सीधी बातचीत की, तो उन्हें एक नई और विविध सच्चाई देखने का मौका मिला।
इजरायल और फिलिस्तीन के प्रतिनिधिमंडलों से मुलाकात
संवाद और शांति को बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत अल नूमी ने बताया कि उन्होंने इजरायल और फिलिस्तीन के दो अलग-अलग प्रतिनिधिमंडलों से भी मुलाकात की है। इन बैठकों का मुख्य उद्देश्य दोनों पक्षों के दृष्टिकोण को करीब लाना और बातचीत को बढ़ावा देना था।
उन्होंने जोर देकर कहा कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद युवा पीढ़ियों को एक ऐसा भविष्य देने की जरूरत है, जहां वे लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में फंसे न रहें और शांति से एक-दूसरे के साथ रह सकें।
खाड़ी देशों में ईरानी जासूसी नेटवर्क का मंडराता खतरा
यह कोई पहला मौका नहीं है जब खाड़ी और अरब देशों में ईरानी स्लीपर सेल या हिजबुल्लाह से जुड़े संगठनों की विध्वंसक गतिविधियां सामने आई हैं। इससे पहले बहरीन ने संवेदनशील स्थानों की जानकारी ईरानी गुर्गों को ट्रांसमिट करने के आरोप में कई संदिग्धों को पकड़ा था।
इसी तरह कतर में भी सैन्य और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर की जासूसी करने वाले सेल का पर्दाफाश हो चुका है। वहीं, यूएई ने भी राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाले ईरान से जुड़े नेटवर्क में शामिल लोगों की गिरफ्तारी की घोषणा की थी।
यूएई का अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (NCEMA) आपदा या मिसाइल हमलों के दौरान कैसे काम करता है?
यूएई का नेशनल अर्ली वॉर्निंग सिस्टम (National Early Warning System) आपातकालीन स्थितियों, जैसे मिसाइल हमलों या प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, तूफान) के समय नागरिकों को तुरंत अलर्ट करने के लिए एक बेहद सटीक तकनीक पर काम करता है। इसे राष्ट्रीय आपातकालीन संकट और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NCEMA) द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
इसकी कार्यप्रणाली के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
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लोकेशन-बेस्ड सेल ब्रॉडकास्ट (Cell Broadcast): यह सिस्टम पूरे देश के फोन एक साथ नहीं बजाता। रडार या मौसम विभाग से जैसे ही किसी खतरे का पता चलता है, सिस्टम केवल उसी प्रभावित इलाके (Risk Zone) के मोबाइल टावरों को एक्टिव करता है। उस इलाके की रेंज में मौजूद हर स्मार्टफोन पर तुरंत अलर्ट पहुंच जाता है।
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समय के अनुसार अलग टोन: लोगों में बेवजह पैनिक न फैले, इसके लिए अलर्ट की आवाज समय के हिसाब से सेट की गई है। सुबह 9:00 बजे से रात 10:30 बजे तक मोबाइल पर तेज सायरन जैसी चुभने वाली आवाज (High-pitch tone) आती है। वहीं, रात 10:30 से सुबह 9:00 बजे के बीच यह एक सामान्य एसएमएस टोन (SMS tone) के रूप में काम करता है।
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स्क्रीन फ्लैश और निर्देश: अलर्ट आते ही फोन की स्क्रीन पर एक इमरजेंसी पॉप-अप मैसेज दिखने लगता है। इसमें अरबी, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में स्पष्ट निर्देश होते हैं, जैसे- “घर के अंदर रहें”, “खिड़कियों से दूर रहें” या “शेल्टर में जाएं”। खतरा पूरी तरह टलने के बाद एक ‘ऑल-क्लियर’ मैसेज भी भेजा जाता है।
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बिना इंटरनेट के काम: इस सिस्टम की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए फोन में इंटरनेट या किसी खास ऐप की जरूरत नहीं होती। नेटवर्क ऑपरेटर (Etisalat या Du) के जरिए यह सीधे फोन के बेसिक सिग्नल का इस्तेमाल करके मैसेज डिलीवर करता है।
अगर किसी को अलर्ट नहीं मिलता है, तो इसका मतलब है कि या तो वे खतरे वाले जोन से बाहर हैं, या उनके स्मार्टफोन की सेटिंग्स में ‘इमरजेंसी अलर्ट’ (Emergency Alerts) का विकल्प बंद है।

