ECI विवाद: आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर कानूनी रास्ते पर हो फैसला

gyanesh kumar
धनंजय
धनंजय शर्मा

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग को लेकर फिर एक बार सियासी घमासान तेज हो गया है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दो चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर), फॉर्म-6 में बदलाव और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई। आरोप है कि कुछ फैसले उनकी जानकारी के बिना लिए गए। विपक्ष ने इस्तीफे और महाभियोग की मांग तेज कर दी है। सत्ता पक्ष आयोग के कामकाज का बचाव कर रहा है। दोनों तरफ से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। लेकिन इस पूरे मामले को सिर्फ राजनीतिक लड़ाई का रूप देना संस्था के लिए घातक साबित हो सकता है।संस्था की विश्वसनीयता दांव परचुनाव आयोग भारतीय लोकतंत्र का संवैधानिक स्तंभ है। अनुच्छेद 324 के तहत यह स्वतंत्र रूप से चुनाव कराने का दायित्व निभाता है। तीन सदस्यीय आयोग में फैसले बहुमत से होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को वीटो का अधिकार नहीं है। अगर आंतरिक असहमति दर्ज हुई है, तो यह आयोग की आंतरिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। असहमति को छिपाना या दबा देना ठीक नहीं, लेकिन उसे तुरंत राजनीतिक हथियार बना देना भी सही नहीं।मतदाता सूची का शुद्धिकरण जरूरी प्रक्रिया है। मृत, स्थानांतरित या दोहरे नाम हटाना लोकतंत्र की सेहत के लिए आवश्यक है। लेकिन प्रक्रिया पारदर्शी, कानून के अनुरूप और सामूहिक निर्णय पर आधारित होनी चाहिए। अगर कोई विचलन हुआ है, तो उसकी जांच होनी चाहिए—नारेबाजी से नहीं, संवैधानिक और कानूनी तंत्र से।कानूनी मार्ग ही उचितसंविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को हटाने की प्रक्रिया स्पष्ट है। महाभियोग का प्रावधान है। संसद में प्रस्ताव लाया जा सकता है, जांच हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट भी संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है। ये रास्ते मौजूद हैं। राजनीतिक दल चाहे सत्ता पक्ष हों या विपक्ष, उन्हें इन कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करना चाहिए। सड़क पर इस्तीफे की मांग, गिरफ्तारी के नारे या संस्था को कठघरे में खड़ा करने का अभियान अल्पकालिक सियासी लाभ दे सकता है, लेकिन लंबे समय में चुनाव आयोग जैसी संस्था की साख को नुकसान पहुंचाता है। एक बार संस्था की विश्वसनीयता घटी तो उसे वापस पाना बहुत मुश्किल होता है।आयोग को भी अपनी तरफ से स्पष्ट और तथ्यात्मक जवाब देना चाहिए। आंतरिक असहमति को कैसे संभाला गया, फैसले किस प्रक्रिया से लिए गए—इन सवालों का जवाब पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। चुप्पी या आधे-अधूरे स्पष्टीकरण से अटकलें और बढ़ती हैं।लोकतंत्र की परीक्षायह विवाद सिर्फ एक व्यक्ति या एक रिपोर्ट का नहीं है। यह इस बात की परीक्षा है कि हम संवैधानिक संस्थाओं को राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनाने से रोक सकते हैं या नहीं। चुनाव आयोग पर सवाल उठना लोकतंत्र में स्वाभाविक है। लेकिन जवाब भी लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से ही आने चाहिए।ज्ञानेश कुमार पर लगे आरोप गंभीर हैं। उनकी जांच हो। दो अन्य आयुक्तों की आपत्तियों की भी जांच हो। प्रक्रिया कानून के दायरे में चले। राजनीतिक दलों को संयम बरतना चाहिए और संस्था को मजबूत करने वाला रुख अपनाना चाहिए। अंत में यही कहा जा सकता है—यह मामला राजनीतिक नहीं, संवैधानिक और कानूनी है। इसे उसी रूप में निपटाया जाना चाहिए। तभी चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता बनी रह पाएगी, जो भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी है।

लेखक एनसीपी अजीत गुट के सचिव हैं।