UP चुनाव 2027: लखनऊ में BJP का किला बच पाएगा या SP मारेगी सेंध?
Yogi Adityanath

उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजधानी लखनऊ सिर्फ एक जिला या निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि सूबे की सत्ता का मुख्य केंद्र है। मुख्यमंत्री आवास, विधानसभा, सचिवालय और प्रमुख प्रशासनिक संस्थाओं की मौजूदगी इसे प्रदेश की सबसे हाई-प्रोफाइल सियासत का अखाड़ा बनाती है। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की कर्मभूमि रही लखनऊ पिछले तीन दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का सबसे मजबूत गढ़ मानी जाती रही है। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (SP) ने इस किले में सेंध लगाते हुए मुकाबले को 7-2 पर ला खड़ा किया था। 2017 में जहां 9 में से 8 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं, वहीं 2022 में सपा ने दो महत्वपूर्ण शहरी सीटों पर कब्जा जमाकर 2027 के लिए नए समीकरणों की नींव रख दी है।
ग्रामीण और सुरक्षित सीटों पर कांटे का मुकाबला
जिले की दो आरक्षित (SC) सीटों—मलिहाबाद और मोहनलालगंज—पर 2022 के चुनाव में बेहद नजदीकी मुकाबला देखा गया था।
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मलिहाबाद (SC): केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर की पत्नी जयदेवी (BJP) ने सपा के सोनू कनौजिया को कड़े संघर्ष के बाद महज 7,745 वोटों के अंतर से हराया था। ग्रामीण परिवेश और बागवानी-किसानी से जुड़ी समस्याओं के चलते यहां विपक्ष ने कड़ी घेराबंदी की थी।
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मोहनलालगंज (SC): अर्ध-शहरी और ग्रामीण ताने-बाने वाली इस सीट पर भाजपा के अमरेश कुमार ने सपा की वरिष्ठ नेता सुशीला सरोज को 16,548 मतों से पराजित किया। यहां स्थानीय सत्ता विरोधी लहर और जातीय गोलबंदी के बीच भाजपा अपनी सीट बचाने में कामयाब रही थी।
पुराने लखनऊ और व्यापारिक बेल्ट में सपा की वापसी
2022 के नतीजों में सपा की सबसे बड़ी कामयाबी पुराने लखनऊ और मध्य क्षेत्र की दो सीटों पर दर्ज हुई, जहां अल्पसंख्यक और व्यापारिक वर्ग ने निर्णायक भूमिका निभाई।
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लखनऊ पश्चिम: मुस्लिम बाहुल्य और घनी आबादी वाले पुराने लखनऊ के इस इलाके में सपा के अरमान खान ने भाजपा के अंजनी श्रीवास्तव को 8,184 वोटों से शिकस्त देकर ‘कमल’ का कब्जा छीना।
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लखनऊ मध्य: हजरतगंज, अमीनाबाद और चौक जैसे प्रमुख बाजारों को समेटने वाली इस सीट पर सपा के वरिष्ठ नेता रविदास मेहरोत्रा ने भाजपा के रजनीश गुप्ता को 10,935 वोटों से हराया। व्यापारियों की स्थानीय नाराजगी और मुस्लिम मतदाताओं के एकतरफा समर्थन ने सपा का पलड़ा भारी किया था।
पॉश कॉलोनियों और कैंट में भाजपा का एकतरफा दबदबा
जिले के उच्च मध्यमवर्गीय, नौकरीपेशा और सवर्ण बहुल इलाकों में भाजपा का वोट बैंक आज भी पूरी तरह अटूट नजर आता है।
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लखनऊ पूर्व: यह सीट जिले में भाजपा का सबसे मजबूत गढ़ साबित हुई, जहां पूर्व मंत्री आशुतोष टंडन (अब स्वर्गीय) ने सपा के अनुराग सिंह को रिकॉर्ड 68,731 वोटों के भारी अंतर से हराया था। बाद में हुए उपचुनाव में भी भाजपा के ओ.पी. श्रीवास्तव ने इस सीट पर कब्जा बरकरार रखा।
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लखनऊ कैंट: वीआईपी सीट पर प्रदेश के डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने सपा के सुरेंद्र सिंह गांधी को 39,512 वोटों के बड़े अंतर से मात दी। कैंटोनमेंट और सरकारी कर्मचारियों की बहुलता वाले इस क्षेत्र में भाजपा की पकड़ पारंपरिक रूप से मजबूत रही है।
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सरोजिनी नगर: एयरपोर्ट और नए आवासीय इलाकों वाले इस क्षेत्र से पूर्व ईडी अधिकारी राजेश्वर सिंह (BJP) ने सपा के पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा को 56,186 वोटों से शिकस्त दी थी।
बख्शी का तालाब और लखनऊ उत्तर का मिजाज
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बख्शी का तालाब (BKT): ग्रामीण और शहरी मिश्रित आबादी वाली इस सीट पर ओबीसी (विशेषकर यादव) और सवर्ण वोटरों की अच्छी तादाद है। यहां भाजपा के योगेश शुक्ला ने सपा के गोमती यादव को 27,788 वोटों से हराया था, हालांकि ग्रामीण पॉकेट्स में सपा की सक्रियता लगातार बनी हुई है।
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लखनऊ उत्तर: अलीगंज और कपूर्थला जैसे इलाकों वाली इस सीट पर भाजपा के मौजूदा विधायक डॉ. नीरज बोरा ने सपा की युवा प्रत्याशी पूजा शुक्ला को 33,953 वोटों से हराया था। युवा और छात्र राजनीति के उभार के चलते इस सीट पर विपक्षी घेराबंदी मजबूत रही थी।
2027 की बिसात: संघ का कैडर बनाम ‘PDA’ का इम्तिहान
लखनऊ में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का सांगठनिक ढांचा, सवर्ण और मध्यमवर्गीय मतदाताओं का समर्थन और अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीतिक विरासत है। साथ ही सांसद व रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सर्वमान्य छवि और आउटर रिंग रोड व मेट्रो जैसे बुनियादी ढांचे के प्रोजेक्ट पार्टी के पक्ष में जमीन तैयार रखते हैं।
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले और कांग्रेस के साथ गठबंधन के जरिए अपने वोट प्रतिशत में इजाफा करने में जुटी है। महंगाई, स्थानीय एंटी-इंकंबेंसी और युवाओं के रोजगार के मुद्दे सपा की मुख्य रणनीति का हिस्सा हैं।
आगामी 2027 के चुनाव में लखनऊ की जनता के सामने ट्रैफिक जाम, ड्रेनेज व्यवस्था, नई कॉलोनियों में बुनियादी नागरिक सुविधाएं, पेयजल और निवेश से जुड़े स्थानीय मुद्दे प्रमुख रहने वाले हैं। राजधानी के ग्रामीण अंचलों और पॉश कॉलोनियों में भाजपा का जनाधार मजबूत है, जबकि पुराने शहर और मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में विपक्षी गठबंधन सीधी टक्कर दे रहा है।
