केन्या में टाटा-अडाणी को झटका, रुटो सरकार अपना रही है आर्थिक राष्ट्रवाद?

Kenya
सैफी हुसैन
सैफी हुसैन

केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो द्वारा लेक मगाडी क्षेत्र में टाटा केमिकल्स को अपना कारोबार बंद करने का आदेश दिए जाने के बाद भारत में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या केन्या सरकार भारतीय कंपनियों को निशाना बना रही है। साल 2024 में नैरोबी एयरपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए अडाणी समूह के प्रस्ताव को रद्द किए जाने के बाद अब टाटा पर गिरी इस गाज ने कई रणनीतिक सवाल खड़े कर दिए हैं।

टाटा केमिकल्स पर क्यों भड़के राष्ट्रपति रुटो?

काजियाडो काउंटी के लेक मगाडी में टाटा केमिकल्स दशकों से सोडा-ऐश निकालने का काम कर रही है, जिसका उपयोग कांच बनाने जैसे उद्योगों में होता है। यह अफ्रीका में इस तरह का सबसे बड़ा प्लांट है। राष्ट्रपति रुटो का तर्क है कि एक विदेशी कंपनी ने करीब एक सदी से इस प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल तो किया, लेकिन वहां कोई बड़ा प्रसंस्करण (processing) उद्योग या स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियां विकसित नहीं कीं।

रुटो चाहते हैं कि केन्या सिर्फ कच्चा माल निकालने और बाहर भेजने तक सीमित न रहे, बल्कि देश के अंदर ही फैक्ट्रियां लगें और वैल्यू एडिशन हो। सरकार ने साफ कर दिया है कि इस क्षेत्र के लिए नए सिरे से बोलियां मंगाई जाएंगी, और नए निवेशकों को काजियाडो में एक बड़ा कांच और केमिकल प्रोसेसिंग प्लांट लगाना होगा। दूसरी ओर, टाटा केमिकल्स का कहना है कि उसने सभी स्थानीय नियमों और कानूनों का पालन किया है तथा वह कानूनी प्रक्रिया के तहत जवाब का इंतजार कर रही है।

भारतीय कंपनियां ही क्यों आ रही हैं निशाने पर?

इतने कम समय में भारत के दो बड़े औद्योगिक समूहों (अडाणी और टाटा) का केन्याई सरकार के फैसलों की जद में आना राजनीतिक रूप से असहज करने वाला जरूर है, खासकर तब जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक संबंध अच्छे रहे हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इसके पीछे किसी देश विशेष के खिलाफ कोई दुर्भावना नहीं, बल्कि केन्या का बदलता ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ है।

अडाणी मामले में जहां चीनी कंपनी के साथ नया अनुबंध सामने आया, वहीं टाटा का मामला पुराने पट्टे और बिजनेस मॉडल से जुड़ा है। रुटो सरकार अब ऐसे विदेशी निवेश चाहती है जो केवल मुनाफा कमाने के बजाय केन्या की औद्योगिक क्षमता बढ़ाएं, स्थानीय युवाओं को रोजगार दें और तकनीक का हस्तांतरण करें।

भारत-केन्या संबंधों के लिए क्या हैं मायने?

यह घटना इस बात का संकेत है कि अफ्रीकी देशों के साथ व्यापार के पारंपरिक नियम अब बदल रहे हैं। केन्या अब कच्चे माल के निर्यात वाले पुराने मॉडल को छोड़कर अपनी धरती पर ही विनिर्माण (manufacturing) को बढ़ावा देने की नीति पर चल रहा है।

भारत और केन्या के बीच अरबों डॉलर का व्यापार और मजबूत कूटनीतिक रिश्ते हैं। ऐसे में भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए यह एक बड़ा सबक है कि अफ्रीका में निवेश का भविष्य अब केवल खनिज दोहन पर नहीं, बल्कि स्थानीय विकास और सहभागिता पर टिका होगा। आने वाले समय में दोनों देशों को कूटनीतिक और कानूनी संवाद के जरिए ऐसे मुद्दों को सुलझाने की जरूरत होगी ताकि आपसी विश्वास बना रहे।