पूरब के वोट? 2027 से पहिले यादव-मुस्लिम, दलित आ OBC पर सभकर नजर

उत्तर प्रदेश के चुनावी राजनीति में पूर्वांचल खाली एगो भौगोलिक इलाका ना, बलुक सत्ता के चाबी माने जाला। 2027 के विधानसभा चुनाव के सुगबुगाहट के बीच अब सबसे बड़ सवाल ई बा कि पूरब के सियासी मिजाज केने जाई। का समाजवादी पार्टी के ‘PDA’ फॉर्मूला 2024 नियन फेर कमाल करी, या भाजपा के गैर-यादव OBC आ सवर्ण गोलबंदी बाजी मारी? चुनाव में जाति, धर्म, स्थानीय चेहरा, रोजगार आ पलायन जइसन मुद्दा मिलके कवन रुख तय करीहें, एकर गुणा-गणित अब जमीन पर देखाए लागल बा।
प्रशासनिक नक्शा ना, सामाजिक आ राजनीतिक पहचान ह पूर्वांचल
सरकारी दस्तावेज में पूर्वांचल नाम से कवनो अलगा प्रशासनिक मंडल नइखे। भाषा, संस्कृति आ राजनीतिक पहचान के आधार पर आमतौर पर वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, मऊ, जौनपुर, बलिया, देवरिया, बस्ती, सिद्धार्थनगर आ सोनभद्र समेत करीब 17 से 23 जिला के एह दायरा में मानल जाला।
सामाजिक बनावट के बात करीं त पूरा पूर्वांचल में कवनो एके फॉर्मूला लागू ना होला। 2011 के जनगणना के मोताबिक सिद्धार्थनगर में मुस्लिम आबादी करीब 29.23 प्रतिशत आ संत कबीर नगर में 23.58 प्रतिशत बा, जबकि वाराणसी में ई आंकड़ा करीब 14.88 प्रतिशत बा। ओही तरह आजमगढ़ आ मऊ के सियासी जमीन गोरखपुर या सोनभद्र से बिल्कुल जुदा बा।
MY समीकरण से आगे ‘PDA’ के नया इम्तिहान
समाजवादी पार्टी के पारंपरिक ताकत यादव आ मुस्लिम (MY) वोट बैंक रहल बा। बाकिर 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नैरेटिव पर दांव लगवलस। कुर्मी, निषाद, बिंद, राजभर, मौर्य आ कुशवाहा जइसन गैर-यादव पिछड़ी जातियन के नुमाइंदगी देवे के फायदा भी मिलल। 2024 में पूर्वी यूपी के 26 लोकसभा सीट में से भाजपा 10 सीट पर सिमट गइल, जबकि 2019 में ऊ 18 सीट जीतले रहे। अब 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा के सोझा सबसे बड़ इम्तिहान बा कि का ई सामाजिक गठबंधन विधानसभा स्तर पर भी एकजुट रह पाई।
भाजपा के गैर-यादव OBC सोशल इंजीनियरिंग आ चुनौती
भाजपा के चुनावी मशीनरी पूर्वांचल में सवर्ण वोट के संगे गैर-यादव अति पिछड़ी जातियन के जोड़ के सबसे मजबूत गठबंधन बनवले रहे। अपना दल (एस) के सहारे कुर्मी-पटेल समाज आ निषाद पार्टी के जरिए मल्लाह-केवट-बिंद वर्ग के साधे के कोशिश लगातार जारी बा। साथे-साथ गोरखपुर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मजबूत सियासी पकड़ भी पूरब में भाजपा के बड़ पूंजी ह। हालांकि, 2024 के नतीजन से ई साफ भइल बा कि वोटर अब खाली पार्टी के नाम पर ना, बलुक उम्मीदवार के छवि आ स्थानीय नाराजगी के आधार पर भी फैसला बदल सकेला।
दलित वोट आ छोट जातियन के गोलबंदी में फंसा पेंच
पूर्वांचल में करीब 20-21 प्रतिशत दलित आबादी बा, जवन कवनो भी सीट के पासा पलट सकेला। एह वर्ग में जाटव, पासी आ अउरी अनुसूचित जातियन के राजनीतिक पसंद हर चुनाव में अलग-अलग देखल गइल बा। बसपा अपना पुरान जनाधार के बचावे के जुगत में बा, त सपा PDA के जरिए एहमें सेंधमारी कइले बा। ओहीजा भाजपा भी बाबा साहेब के विचार आ कल्याणकारी योजना के दम पर दलितन के साधे में लागल बा।
एह बड़का समूहन के अलावा राजभर, निषाद, नोनिया-चौहान आ सैंथवार जइसन छोट-छोट आबादी वाला समूह भी कई सीट पर निर्णायक बन जालें। गाजीपुर, मऊ, बलिया, कुशीनगर आ महराजगंज में एह छोट जातियन के गोलबंदी चुनावी जीत-हार के तय करेला।
जाति के गणित पर भारी पड़ी रोजगार आ विकास के सवाल?
2027 के चुनाव खाली जात-पात के जोड़-घटाव पर सीमित ना रही। पूर्वांचल के युवा वर्ग खातिर रोजगार, भर्ती परीक्षा, पलायन आ उद्योग-धंधा एगो बड़ मुद्दा बन चुकल बा। खेती-किसानी, बाढ़ के मार, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा आ कानून-व्यवस्था के सवाल भी वोटर के मन पर सीधा असर डाली। अंत में कवन दल स्थानीय समीकरण, मजबूत संगठन आ जमीनी मुद्दन के ठीक से साधेला, ऊहे पूर्वांचल के सियासी रण फतह करी।
