शहीद की 80 साल की मां का छलका दर्द, बोलीं- ‘वापस ले लो शौर्य चक्र’

देश के लिए अपनी जान कुर्बान करने वाले बेटे के परिवार को 22 साल से न्याय के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। राजधानी लखनऊ के सरोजनीनगर तहसील में लगे संपूर्ण समाधान दिवस के दौरान प्रशासनिक संवेदनहीनता का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। शौर्य चक्र विजेता शहीद असिस्टेंट कमांडेंट विवेक सक्सेना की 80 वर्षीय मां सावित्री सक्सेना और उनके बड़े भाई जब न्याय की गुहार लगाने पहुंचे, तो अधिकारियों ने उन्हें मदद देने के बजाय अपमानित किया।
तहसीलदार के दोटूक बोल- ‘जमीन नहीं मिलेगी, जैसे भाग रहे हो भागते रहो’
परिवार के मुताबिक, संपूर्ण समाधान दिवस में जब वे अपनी फाइल लेकर पहुंचे तो तहसीलदार ने दस्तावेज देखते ही बेहद रुखा रवैया अपनाया। आरोप है कि तहसीलदार ने दोटूक शब्दों में कहा, “जमीन तो तुम्हें मिलेगी नहीं। जैसे सालों से भाग रहे हो, वैसे ही भागते रहो। अब यह फाइल नगर निगम जाएगी।”
इस अपमानजनक व्यवहार से 80 वर्षीय मां अंदर से टूट गईं। उन्होंने व्यथित होकर कहा कि जब बेटे की शहादत के बाद भी परिवार को सिर्फ जिल्लत और धक्के ही खाने हैं, तो सरकार उनके बेटे को मिला शौर्य चक्र, राष्ट्रपति पुलिस पदक और सम्मान राशि वापस ले ले।
मणिपुर में आतंकियों से मुकाबला करते हुए शहीद हुए थे विवेक
लखनऊ के कृष्णा लोक कॉलोनी (दरोगा खेड़ा) के रहने वाले विवेक सक्सेना 8 जनवरी 2003 को मणिपुर में आतंकवादियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे। उनकी वीरता और अदम्य साहस को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें शौर्य चक्र और राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित किया था। उनकी स्मृति में एयरफोर्स स्टेशन मेमौरा में एक मेमोरियल भी बनाया गया है। शहादत के तुरंत बाद सरकार ने परिवार को ग्रामीण कोटे से जमीन देने और एक स्मारक पार्क बनवाने का वादा किया था, जो पिछले दो दशकों से सिर्फ कागजों में उलझ कर रह गया है।
साल 2016 में जगी थी उम्मीद, फिर अटका पेंच
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डीएम का निर्देश: साल 2016 में तत्कालीन डीएम राजशेखर ने मामले का संज्ञान लेते हुए 15 दिन के भीतर जमीन आवंटित करने और स्मारक के निर्देश दिए थे। प्रक्रिया शुरू भी हुई, लेकिन अधिकारियों ने नया पेंच फंसा दिया।
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मूल निवास का विवाद: अधिकारियों ने परिवार से उत्तर प्रदेश का मूल निवास साबित करने को कहा और यहां तक मांग रख दी कि शादी से पहले शहीद की मां कहां रहती थीं, उसका हलफनामा (Affidavit) लाएं। परिवार ने जब यह औपचारिकता भी पूरी कर दी, तो उसे अधूरा बताकर खारिज कर दिया गया।
सरकार का ही पुराना चेक बना सबसे बड़ा सबूत
दौड़-भाग के इस लंबे सफर में परिवार को यूपी सरकार की ओर से जारी एक पुरानी रसीद मिली, जिसमें शहादत के बाद इसी लखनऊ के पते पर 75,000 रुपये का चेक जारी किए जाने का जिक्र था। इस रसीद के सामने आते ही अधिकारियों के सारे बहाने धरे के धरे रह गए। परिवार का यह भी आरोप है कि शौर्य चक्र से जुड़ी सम्मान राशि पाने के लिए भी उन्हें साल 2024 तक लंबा इंतजार करना पड़ा। फाइलों को जानबूझकर एक टेबल से दूसरी टेबल पर घुमाया गया।
मामला मीडिया में तूल पकड़ने के बाद अब एसडीएम ने इसकी नए सिरे से जांच कर एक हफ्ते के भीतर उचित निस्तारण के निर्देश दिए हैं, लेकिन सवाल यह है कि दो दशक से इंसाफ के लिए भटक रहे परिवार का यह इंतजार कब खत्म होगा।
