ओवैसी का ‘ब्राह्मण कार्ड’, जानें AIMIM के इस सियासी दांव के क्या हैं मायने

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गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

लखनऊ : हैदराबाद के सांसद और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को अमूमन एक ‘मुस्लिम पार्टी’ का नेता माना जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की सुगबुगाहट के बीच ओवैसी ने एक ऐसा दांव चला है जिसने सूबे के राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। पार्टी ने आगामी चुनाव में एक ब्राह्मण चेहरे को टिकट देने का ऐलान किया है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक मुस्लिम बहुल पार्टी अचानक ब्राह्मणों पर क्यों फोकस कर रही है और क्या यूपी का ब्राह्मण वोटर ओवैसी की बात सुनेगा?

कब और कैसे हुई AIMIM में ‘ब्राह्मण कार्ड’ की शुरुआत?

यह पहली बार नहीं है जब ओवैसी ने किसी सवर्ण को टिकट दिया है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में AIMIM ने गाजियाबाद जिले की साहिबाबाद सीट से पंडित मनमोहन झा उर्फ गामा को मैदान में उतारा था। झा 24 साल तक समाजवादी पार्टी में थे और टिकट न मिलने पर ओवैसी के पाले में आ गए थे।

उस चुनाव में AIMIM की 66 उम्मीदवारों की लिस्ट में 11 (करीब 16 प्रतिशत) हिंदू थे। ओवैसी ने इस फैसले को अपनी ‘सबको साथ लेने’ की नीति बताया था। हालांकि मनमोहन झा चुनाव नहीं जीत पाए और उन्हें 4,305 वोट मिले, लेकिन इस आंकड़े ने AIMIM को यह संकेत दे दिया कि वह गैर-मुस्लिम मतदाताओं तक भी पहुंच बना सकती है।

यूपी में क्यों अहम है ब्राह्मण वोटों का गणित?

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण वोट हमेशा से ‘किंगमेकर’ की भूमिका में रहा है। राज्य में ब्राह्मणों की आबादी करीब 10-12 प्रतिशत है, लेकिन उनका सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव इस आंकड़े से कहीं ज्यादा है।

परंपरागत रूप से यह वोट बैंक बीजेपी और कांग्रेस के बीच बंटता रहा है, लेकिन हाल के चुनावों में इसका बड़ा झुकाव बीजेपी की ओर रहा है। समाजवादी पार्टी (SP) के मुखिया अखिलेश यादव भी इस अहमियत को समझते हैं, इसीलिए वे अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के ‘P’ को ‘पंडित’ से भी जोड़ रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि यूपी का ब्राह्मण ‘पीड़ा’ में है। बीजेपी, सपा, बसपा और अब AIMIM—हर पार्टी इस 12% वोट बैंक को साधने की जुगत में है।

मायावती वाले ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूले पर ओवैसी?

ओवैसी की कोशिश मुस्लिम-ब्राह्मण गठजोड़ का एक नया समीकरण तैयार करने की है। यह रणनीति यूपी के लिए नई नहीं है; बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती ने 2007 में ब्राह्मण-दलित गठबंधन (सोशल इंजीनियरिंग) के दम पर ही पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी।

जानकारों का मानना है कि ओवैसी अब सिर्फ मुस्लिम वोटों पर निर्भर नहीं रहना चाहते। 2021 में बाराबंकी में कुर्मी समाज के नेता बेनी प्रसाद वर्मा की तारीफ करना भी उनकी इसी ‘विस्तारवादी’ रणनीति का हिस्सा था। महाराष्ट्र निकाय चुनावों और बिहार के सीमांचल में मिली कामयाबी ने उन्हें यह भरोसा दिया है कि पार्टी का दायरा बढ़ाया जा सकता है।

‘मुसलमान अब दरी नहीं बिछाएंगे’

2027 के चुनाव अभियान का आगाज ओवैसी ने बहराइच के मटेरा से किया है। यहां उन्होंने एक सख्त राजनीतिक संदेश देते हुए कहा, ‘अब मुसलमान दरी बिछाने की राजनीति नहीं करेंगे, बल्कि हिस्सेदारी और बराबरी की लड़ाई होगी।’

इसके साथ ही उन्होंने अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए उन पर ‘मुसलमान प्रेम की नौटंकी’ करने का आरोप लगाया। ओवैसी ने सपा प्रमुख को गठबंधन का ऑफर देते हुए चेतावनी दी कि अगर वे साथ नहीं आए, तो यूपी में उनका हाल भी बिहार के तेजस्वी यादव जैसा होगा। ओवैसी एक तरफ ब्राह्मणों को साध रहे हैं, तो दूसरी तरफ सपा के कोर मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।