MP में अनोखा ‘Snake Census’, सांपों की गिनती से बचेगी इंसानों की जान

भोपाल: मध्य प्रदेश के जंगलों में इन दिनों एक बेहद दिलचस्प और अनूठा वैज्ञानिक अभियान चल रहा है, जिसे आम बोलचाल में ‘स्नेक सेंसस’ कहा जा रहा है। हालांकि, यह पारंपरिक अर्थों में सांपों की कोई गिनती नहीं है। देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और मध्य प्रदेश वन विभाग मिलकर राज्य के पांच प्रमुख संरक्षित क्षेत्रों में सांपों की विभिन्न प्रजातियों, उनकी मौजूदगी, संख्या के रुझान और प्राकृतिक व्यवहार को समझने की एक बड़ी कवायद कर रहे हैं। मार्च 2026 में शुरू हुआ यह अध्ययन 2027 के अंत तक चलेगा।
मुख्यमंत्री के एक विचार से शुरू हुई पड़ताल
इस पूरे अभियान की नींव मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के उस विचार पर रखी गई, जिसमें उन्होंने राज्य में सांप काटने की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जताई थी। इसके साथ ही यह सवाल भी सामने आया था कि क्या ऐतिहासिक रूप से मध्य प्रदेश में किंग कोबरा मौजूद था और क्या उसकी अनुपस्थिति का असर दूसरी प्रजातियों पर पड़ा है? इन सवालों के वैज्ञानिक जवाब तलाशने के लिए ही इस व्यापक अध्ययन की रूपरेखा तैयार की गई।
पांच अलग-अलग पारिस्थितिकी तंत्र में सर्वे
शोधकर्ताओं और वन विभाग की टीमें पांच चुनिंदा संरक्षित क्षेत्रों में काम कर रही हैं:
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कान्हा टाइगर रिजर्व: पूर्वी मध्य प्रदेश के मैकल क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
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सतपुड़ा टाइगर रिजर्व: मध्य भारत के घने जंगलों का हिस्सा है।
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पन्ना टाइगर रिजर्व: बुंदेलखंड के अपेक्षाकृत सूखे वन क्षेत्र में स्थित है।
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गांधी सागर वन्यजीव अभयारण्य: अपने खुले घास के मैदानों और सवाना जैसे क्षेत्र के लिए जाना जाता है।
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अमरकंटक: विंध्य और सतपुड़ा का मिलन स्थल, जहां से नर्मदा और सोन नदियां निकलती हैं।
रोड क्रूजिंग और जीपीएस टैगिंग तकनीक
इस प्रोजेक्ट में करीब 15 शोधकर्ता और 100 से अधिक प्रशिक्षित वनकर्मी शामिल हैं। टीमें दिन और रात के समय जंगल की सड़कों पर धीमी गति से वाहन चलाकर सांपों की गतिविधि दर्ज करती हैं, जिसे ‘रोड क्रूजिंग’ कहा जाता है। सांप दिखने पर उसकी तस्वीर और जीपीएस लोकेशन दर्ज कर शोधकर्ताओं को भेजी जाती है, जिससे प्रजाति की पहचान कर डेटाबेस तैयार किया जाता है। आने वाले समय में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण जहरीली प्रजातियों पर रेडियो टेलीमेट्री (रेडियो ट्रैकर) का उपयोग करने की भी योजना है, जिससे उनके मूवमेंट और व्यवहार को बारीकी से समझा जा सके।
क्यों जरूरी है यह अध्ययन? (आंकड़े और चुनौतियां)
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बढ़ते मामले: एकीकृत स्वास्थ्य सूचना कार्यक्रम के अनुसार, एमपी में सांप काटने के मामले 2022 के 1,208 से बढ़कर 2024 में 3,334 हो गए हैं।
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मुआवजे के आंकड़े: अप्रैल 2020 से मार्च 2022 के बीच राज्य में सांप काटने से हुई 5,779 मौतों पर करीब 231 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया, जो एक बड़ी प्रशासनिक चुनौती को दर्शाता है।
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‘बिग फोर’ और हॉटस्पॉट: उज्जैन के सर्प अनुसंधान संगठन के मुताबिक एमपी में सांपों की करीब 50 प्रजातियां हैं, जिनमें 9 जहरीली हैं। इनमें ‘बिग फोर’ (भारतीय कोबरा, सामान्य करैत, रसेल वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर) शामिल हैं। राज्य के 16 जिलों (जैसे अलीराजपुर, बालाघाट, सागर, सतना, छिंदवाड़ा आदि) को इसके लिए संवेदनशील हॉटस्पॉट माना गया है।
अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कैसे बनेगा मददगार
इस रिसर्च का सबसे बड़ा फायदा स्वास्थ्य विभाग को मिल सकता है। यदि यह डेटा स्पष्ट कर दे कि किस इलाके में कौन-सी जहरीली प्रजाति (जैसे रसेल वाइपर या करैत) ज्यादा सक्रिय है और वहां काटने के मामले अधिक हैं, तो मानसून से पहले उन अस्पतालों में एंटी-स्नेक वेनम का पर्याप्त भंडारण, डॉक्टरों का प्रशिक्षण और एम्बुलेंस नेटवर्क को मजबूत किया जा सकता है। इस वैज्ञानिक डेटाबेस को सीधे आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़कर इंसानी जिंदगियां बचाने का प्रयास किया जा रहा है।
