नाग पंचमी पर सांप की पूजा समझ आती है, लेकिन गुड़िया क्यों पीटी जाती है?

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शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

सावन का महीना हो और नाग पंचमी का दिन आए तो मंदिरों में नाग देवता की पूजा, शिवलिंग पर जलाभिषेक और दूध चढ़ाने की तस्वीरें आम हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इसी दिन एक ऐसी परंपरा भी देखने को मिलती है, जिसे पहली बार देखने वाला शायद दो मिनट तक यही सोचता रहे कि “ये आखिर हो क्या रहा है?”

चौराहे पर कपड़े की गुड़िया रखी जाती है और बच्चे या युवक उसे डंडियों से पीटते हैं।

अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि नाग पंचमी का सांप से तो संबंध समझ में आता है, लेकिन इस गुड़िया का नाग देवता से क्या रिश्ता है?

इस सवाल का जवाब किसी एक किताब या एक निश्चित कथा में नहीं मिलता। गांव-कस्बों में इस परंपरा से जुड़ी अलग-अलग कहानियां सुनाई जाती हैं। यही वजह है कि गुड़िया पीटने की रस्म को धर्मशास्त्र से ज्यादा स्थानीय लोकविश्वास और परंपरा के नजरिए से समझना बेहतर है।

गुड़िया कोई खिलौना नहीं, एक लोककथा का प्रतीक है

इस परंपरा में इस्तेमाल होने वाली गुड़िया आमतौर पर बाजार से खरीदी हुई कोई महंगी गुड़िया नहीं होती। पुराने कपड़ों से घर की महिलाएं या बच्चियां इसे तैयार करती हैं।

कपड़ा, रूई या दूसरे साधारण सामान से गुड़िया बनती है। उसे सजाया जाता है और फिर नाग पंचमी के दिन चौराहे या किसी सार्वजनिक स्थान पर ले जाया जाता है। इसके बाद लड़के या बच्चे डंडियों से उस गुड़िया को पीटते हैं।

आज के समय में यह दृश्य भले ही थोड़ा अजीब लगे, लेकिन लोक परंपराओं में प्रतीकों का अपना संसार होता है। यहां गुड़िया खुद में असली व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पुरानी कहानी और सामुदायिक स्मृति का प्रतीक मानी जाती है।

सबसे ज्यादा सुनाई जाने वाली कहानी क्या है?

इस परंपरा के पीछे एक लोककथा काफी प्रचलित है। कहानी के मुताबिक, एक नाग गरुड़ से अपनी जान बचाकर भाग रहा था। जान बचाने के लिए उसने एक महिला से मदद मांगी। महिला ने उसे छिपा लिया।

लेकिन बाद में वह इस बात को अपने तक नहीं रख सकी और नाग के बारे में दूसरे लोगों को बता दिया।

लोककथा में आगे बताया जाता है कि नाग इस बात से नाराज हुआ और उसने महिला को श्राप दिया। इसी श्राप से जोड़कर यह मान्यता सामने आती है कि नाग पंचमी के दिन महिलाओं की पिटाई की जाएगी।

बदलते समय के साथ वास्तविक व्यक्ति की जगह कपड़े की गुड़िया ने ले ली और उसके साथ प्रतीकात्मक रूप से यह रस्म निभाई जाने लगी। यह कहानी पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती रही है, लेकिन इसे ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित घटना नहीं, बल्कि लोककथा के रूप में ही देखना चाहिए।

एक कहानी राजा की बेटी ‘गुड़िया’ की भी

एक दूसरी लोककथा इस परंपरा को एक लड़की से जोड़ती है, जिसका नाम ही गुड़िया बताया जाता है।

कहानी के अनुसार वह एक राजा की बेटी थी और उसे किसी दूसरे राज्य के राजकुमार से प्रेम हो गया था। उसके भाइयों को यह रिश्ता पसंद नहीं था।

लोककथा कहती है कि भाइयों ने गुस्से में अपनी बहन को पीटा और उसकी मौत हो गई। समय बीतने के साथ इस कहानी ने लोक परंपरा का रूप लिया और लड़की के प्रतीक के तौर पर कपड़े की गुड़िया बनाई जाने लगी।

हालांकि इस कथा के भी अलग-अलग इलाकों में अलग संस्करण मिलते हैं। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि इनमें से कौन-सी कहानी मूल है।

लोककथाओं की यही खासियत है, कहानी चलती रहती है और रास्ते में उसके कई संस्करण पैदा हो जाते हैं।

नाग पंचमी में ही क्यों जुड़ी यह रस्म?

इसका जवाब भी लोकविश्वास में ही मिलता है। नाग पंचमी मूल रूप से नागों की पूजा और उनसे जुड़े धार्मिक विश्वासों का पर्व है। भारतीय लोकजीवन में नागों को धरती, वर्षा, खेती और प्रकृति से भी जोड़ा गया है।

गांवों में कभी सांपों से सामना होना आम बात थी। इसलिए नागों को लेकर डर भी था और सम्मान भी। इसी सांस्कृतिक माहौल में अलग-अलग क्षेत्रों ने नाग पंचमी के साथ अपनी स्थानीय परंपराएं जोड़ लीं।

कहीं दंगल हुआ, कहीं मेले लगे और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में ‘गुड़िया’ की यह रस्म भी नाग पंचमी का हिस्सा बन गई।

यानी हर जगह नाग पंचमी बिल्कुल एक जैसी नहीं मनाई जाती।

यूपी के कुछ इलाकों में आज भी दिखती है यह परंपरा

गुड़िया पीटने की परंपरा खास तौर पर उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में प्रचलित रही है।

कानपुर, उन्नाव और बुंदेलखंड के कुछ इलाकों में इसके अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। कई जगह चौराहे पर गुड़िया रखकर रस्म पूरी की जाती है तो कहीं इसे तालाब या दूसरे सार्वजनिक स्थान से जोड़कर मनाया जाता है।

शहरों में यह परंपरा पहले की तुलना में कम दिखाई देती है, लेकिन छोटे कस्बों और गांवों में आज भी इसकी याद और कहीं-कहीं इसका चलन मौजूद है।

लेकिन क्या शास्त्रों में गुड़िया पीटने का नियम है?

यहां एक बात बिल्कुल साफ समझने वाली है। नाग पंचमी पर गुड़िया पीटना कोई ऐसा सार्वभौमिक धार्मिक विधान नहीं है, जिसे पूरे देश में अनिवार्य रूप से मानने की बात हो।

यह मुख्य रूप से एक क्षेत्रीय लोक परंपरा है। भारत में त्योहारों की परंपराएं इलाके के साथ बदलती रही हैं। एक राज्य में जो रस्म महत्वपूर्ण है, जरूरी नहीं कि दूसरे राज्य में उसका कोई अस्तित्व भी हो।

इसलिए गुड़िया पीटने की परंपरा को नाग पंचमी की अनिवार्य धार्मिक रस्म बताना सही नहीं होगा।

आज के दौर में इस परंपरा को लेकर सवाल भी उठते हैं

समय बदलता है तो परंपराओं को देखने का नजरिया भी बदलता है।

आज कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि अगर गुड़िया को किसी महिला के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, तो उसे पीटने की रस्म को उत्सव का हिस्सा क्यों बनाया जाए?

दूसरी ओर, परंपरा को मानने वाले लोग इसे हिंसा के रूप में नहीं, बल्कि पुरानी लोककथा की प्रतीकात्मक रस्म के तौर पर देखते हैं।

इसलिए इस परंपरा को समझने के लिए उसके सांस्कृतिक संदर्भ को देखना जरूरी है, न कि सिर्फ आज की नजर से उसके एक दृश्य को देखकर फैसला कर देना।

बदलते समय के साथ ‘गुड़िया’ भी बदल रही है

पहले गांवों में त्योहार सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं होते थे। वे पूरे समुदाय के मिलने-जुलने का अवसर भी होते थे। बच्चे सुबह से त्योहार की तैयारी करते, महिलाएं घर में पकवान बनातीं और शाम होते-होते पूरा मोहल्ला या गांव एक जगह जमा हो जाता।

अब शहर बढ़ गए हैं, परिवार छोटे हो गए हैं और त्योहार मनाने का तरीका भी बदल गया है।

मोबाइल की स्क्रीन पर नाग पंचमी की शुभकामनाएं भेजना आसान हो गया है, लेकिन चौराहे पर बैठकर कपड़े की गुड़िया बनाना शायद उतना आसान नहीं रहा। इसीलिए कई लोक परंपराएं धीरे-धीरे यादों में सिमट रही हैं।

तो आखिर नाग पंचमी पर गुड़िया क्यों पीटी जाती है?

इसका सबसे ईमानदार जवाब यही है कि इसके पीछे एक नहीं, कई लोककथाएं हैं।

कहीं इसे नाग के श्राप से जोड़ा जाता है, कहीं गुड़िया नाम की लड़की की कहानी से और कहीं इसे नाग से जुड़ी किसी पुरानी घटना का प्रतीक माना जाता है।

इनमें से किसी एक कहानी को निश्चित ऐतिहासिक सत्य कहना मुश्किल है। लेकिन इतना जरूर है कि यह परंपरा उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों की लोक-संस्कृति का हिस्सा रही है। और शायद यही भारतीय त्योहारों की सबसे दिलचस्प बात है।

एक ही नाग पंचमी पर कहीं नाग देवता को दूध चढ़ाया जा रहा होता है, कहीं शिव मंदिर में घंटियां बज रही होती हैं और कहीं बच्चे कपड़े की गुड़िया लेकर चौराहे पर पहुंच जाते हैं।

त्योहार एक, परंपराएं अनेक और कहानियां उससे भी ज्यादा। यही तो भारत की लोक-संस्कृति का असली रंग है। 🐍

एक लाइन में समझिए

नाग पंचमी पर गुड़िया पीटने की रस्म उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों की पुरानी लोक परंपरा है, जिसके पीछे अलग-अलग लोककथाएं प्रचलित हैं। इसे नाग पंचमी की अनिवार्य धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि क्षेत्रीय लोकविश्वास के रूप में समझना ज्यादा उचित है।