Vande Mataram : इमरान मसूद बोले- ‘सम्मान करूंगा, लेकिन गाऊंगा नहीं’

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Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

वंदे मातरम् को लेकर जारी राजनीतिक बहस के बीच कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने एक बार फिर अपना रुख स्पष्ट किया है।

मसूद का कहना है कि उनकी धार्मिक मान्यताएं उन्हें अल्लाह के अलावा किसी की वंदना या इबादत करने की इजाजत नहीं देतीं। इसलिए वह वंदे मातरम् नहीं गाएंगे।

हालांकि, उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि वह राष्ट्रीय गीत का किसी भी स्थिति में अपमान नहीं करेंगे और उसके सम्मान में खड़े रहेंगे।

यानी मसूद का संदेश है, गीत का सम्मान अपनी जगह, धार्मिक आस्था अपनी जगह।

‘अल्लाह के सिवा किसी की इबादत नहीं कर सकता’

इमरान मसूद ने कहा कि उनका धर्म उन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इबादत करने की स्वतंत्रता देता है। उन्होंने संविधान में मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला देते हुए कहा कि कोई भी उनसे यह अधिकार नहीं छीन सकता।

उनके मुताबिक, वह अल्लाह के अलावा किसी की वंदना या इबादत नहीं कर सकते और इसी वजह से वंदे मातरम् गाने को लेकर उनकी असहमति है।

हालांकि, उन्होंने वंदे मातरम् के प्रति किसी तरह का अपमानजनक रवैया अपनाने से साफ इनकार किया।

‘अपमान नहीं करूंगा, लेकिन गाऊंगा भी नहीं’

मसूद ने अपने रुख को एक लाइन में स्पष्ट कर दिया है। वह वंदे मातरम् का सम्मान करेंगे, लेकिन इसे गाएंगे नहीं।

उन्होंने यह भी कहा कि देशभक्ति साबित करने के लिए किसी व्यक्ति को किसी खास तरीके से अपनी धार्मिक मान्यता के खिलाफ जाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए।

उनका तर्क है कि देश के प्रति सम्मान और धार्मिक आस्था को एक ही तराजू में नहीं तौला जाना चाहिए। यहां से राजनीतिक बहस फिर उसी पुराने सवाल पर पहुंच जाती है, जहां राष्ट्रभक्ति का पैमाना कौन तय करेगा, इस पर राजनीति गरम हो जाती है।

संविधान का हवाला देकर बोले मसूद

इमरान मसूद ने अपने बयान में संविधान में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का जिक्र किया। उनका कहना है कि संविधान नागरिकों को अपने धर्म के अनुसार आस्था और उपासना की स्वतंत्रता देता है।

इसी आधार पर उनका कहना है कि वंदे मातरम् गाना उनके लिए धार्मिक रूप से स्वीकार्य नहीं है, लेकिन इसका सम्मान करना उनके लिए अलग विषय है।

हालांकि, वंदे मातरम् को लेकर कानूनी और संवैधानिक स्थिति, तथा अलग-अलग सार्वजनिक अवसरों पर इसके गायन से जुड़े नियमों को लेकर बहस अलग विषय है। इसलिए राजनीतिक बयान और कानूनी बाध्यता को एक ही चीज मानना ठीक नहीं होगा।

BJP पर लगाया ‘राजनीतिक हथियार’ बनाने का आरोप

वंदे मातरम् के मुद्दे पर मसूद ने भारतीय जनता पार्टी पर भी हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि BJP राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान जैसे संवेदनशील मुद्दों को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।

मसूद का कहना है कि किसी व्यक्ति को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए किसी राजनीतिक दल से प्रमाणपत्र लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस के अधिवेशनों में पहले से वंदे मातरम् गाया जाता रहा है।

‘देशभक्ति का सर्टिफिकेट किसी पार्टी से नहीं चाहिए’

इमरान मसूद के बयान का राजनीतिक संदेश भी काफी स्पष्ट है।

उनका कहना है कि देशभक्ति को किसी एक गीत, नारे या राजनीतिक दल के मानक से नहीं मापा जाना चाहिए।

यानी उनके मुताबिक किसी नागरिक का राष्ट्र के प्रति सम्मान और उसकी धार्मिक मान्यता दो अलग-अलग बातें हो सकती हैं।

यही वह बिंदु है जहां वंदे मातरम् का मुद्दा सांस्कृतिक बहस से निकलकर सीधे राजनीति और संविधान की बहस में प्रवेश कर जाता है।

‘दिमागी नक्सलवाद’ पर भी BJP को घेरा

इमरान मसूद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दिमागी नक्सलवाद’ वाले बयान पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने BJP पर धर्म और नफरत की राजनीति करने का आरोप लगाया।

मसूद ने कहा कि जिस धर्म में प्रेम और सहिष्णुता की बात होती है, उसके नाम पर नफरत फैलाना गलत है।

हालांकि, उनके इन आरोपों पर BJP की ओर से अलग राजनीतिक प्रतिक्रिया आना तय माना जा रहा है, क्योंकि वंदे मातरम् का मुद्दा पहले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का नया मैदान बन चुका है।

वंदे मातरम् पर क्यों गरम है सियासत?

वंदे मातरम् भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में विशेष संवैधानिक और ऐतिहासिक महत्व रखता है। यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक बना था।

इसी वजह से जब इसके गायन, सम्मान या धार्मिक स्वीकार्यता को लेकर कोई राजनीतिक बयान आता है तो बहस तेजी से गरमा जाती है।

एक पक्ष इसे राष्ट्रीय सम्मान और एकता का प्रतीक मानता है, जबकि दूसरा पक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आस्था के अधिकार पर जोर देता है।

नतीजा यह कि एक गीत फिर से संसद से सोशल मीडिया तक राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाता है।

विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल

मसूद का रुख फिलहाल साफ है:

वंदे मातरम् का अपमान नहीं करेंगे, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के कारण इसे नहीं गाएंगे। अब राजनीतिक विवाद इस बात पर है कि क्या किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान व्यक्त करने का एक ही तरीका होना चाहिए या संविधान व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को भी समान महत्व देता है। यही बहस आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है।

गीत का सम्मान या उसका गायन, दोनों एक ही बात हैं?

इमरान मसूद ने अपने बयान से वंदे मातरम् विवाद को धार्मिक स्वतंत्रता बनाम राष्ट्रीय सम्मान की बहस में फिर ला दिया है।

उनका कहना है कि वह वंदे मातरम् का सम्मान करेंगे और इसके दौरान खड़े भी होंगे, लेकिन अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण इसे नहीं गाएंगे। दूसरी ओर, इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों के बीच मतभेद जारी हैं। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि ‘वंदे मातरम् कौन गाएगा?’

बड़ा सवाल यह है कि क्या देशभक्ति व्यक्त करने का तरीका तय किया जा सकता है, और अगर हां, तो उस सीमा के बाद व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता कहां से शुरू होती है?

यही वह बहस है जो आने वाले दिनों में वंदे मातरम् को फिर राजनीति के केंद्र में रख सकती है।